कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 204, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेहादिक के द्वारा सभी ओर से उस महासागर को उन्होंने भर दिया था । तात्पर्य यह है कि उन्होंने इतना अधिक अपने शरीर को बढ़ा लिया था कि वह पूरा सागर उससे भी गया था । उस महासागर के जल को भी अतिक्रमण करके अत्यन्त उन्नतपूर्ण शरीर वाले का अवलोकन करके जो कि शिलाओं से घिरे हुए, लम्बा चौड़ा मानसाचल के तुल्य था । सम्पूर्ण सागर को रोकने वाले और अपने देह के विस्तार से अचल करके श्रीमान् स्वायम्भुव मनु ने उस समय उनको मत्स्य नहीं माना था । उस अवसर पर स्वायम्भुव मनु ने उस मत्स्य से फिर शान्तिपूर्वक पूछा था जबकि उनकी अद्भुत मूर्ति का दर्शन किया था और उनके छोटेपन को देखा था। मनु ने कहा-हे परमश्रेष्ठ! मैं केवल आपको मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप कौन हो, यह मुझे स्पष्ट बतलाने की कृपा करिए ? हे सुमहत्तप! मैं आपके महत्व को और छोटेपन कर चिन्तन करते हुए ही आपको सामान्य मत्स्य ही नहीं मानता हूँ। आप ब्रह्मा हैं अथवा विष्णु हैं या आप शम्भु हैं जिन्होंने यह मत्स्य का स्वरूप धारण किया है। यदि इसमें कुछ गोपनीयता न हो तो, हे महाभाग! हे महामते! मुझे यह स्पष्ट बतलाने की कृपा करिए । मत्स्य भगवान ने कहा-आपके द्वारा मेरी नित्य ही आराधना करनी चाहिए जो सनातन हरि भगवान हैं वही मैं हूँ। इस समय आपकी कामना की सिद्धि के ही लिए में समादित होकर प्रकट हुआ हूँ। हे भूतों के स्वामिन्! आप जो भी मुझ मीन की मूर्ति वाले से जो भी कुछ चाहते हैं वही आज करूँगा। मेरी इस मूर्ति को मन ही समझिए। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-अपरिमित तेज के धारण करने वाले भगवान विष्णु के इस वचन का श्रवण करके और प्रत्यक्ष रूप के केवल भगवान् विष्णु का ज्ञान प्राप्त करके मनु प्रसन्न हुए थे । स्वायम्भुव मनु ने कहा-हे हरे! इस जगत के पर और अपर के आप स्वामी हैं। आप अविनाशी हैं तथा अग्नि, सूर्य और चन्द्र इनको ही तीन नेत्रों को धारण करने वाले हैं। आपकी सेवा में मेरा प्रतिपात निवेदित है। हे सर्वज्ञ! आप जगत के कारण हैं, जगत के धाम हैं, हे