भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 253, कुल 442 में से

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पृष्ठ 253

ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ २५५ दक्षिण पार्श्व में रति थी और वाम में पुष्प से वृत तथा पुष्प माला सहित प्रीति थी। पीछे की ओर सुन्दर बसन्त तूणीर और पौष्य का समाधान करके स्थित था। जिस समय कामदेव ने संयत होकर पुष्प चाप को कानों तक खींच कर प्रस्तुत था उसी समय उसके समीप में वायु समुपस्थित हो गया था और इन्द्रिय के विकार समुत्पन्न होने वाले होकर संगम के लिए ग्रहण करने की इच्छा वाले हो गये थे। इन्द्र के सहित सब देवगण उस अवसर पर उपस्थित थे। उन्होंने कामदेव को परम सभ्य माना था क्योंकि वह देवों के कृत्य में निवेशित हो रहा था। इसके अनन्तर महादेवजी ने संस्मरण करके और उस अवसर पर मानसिक विचार को रोककर जो कि इन्द्रिय का हुआ था उन्होंने तुरन्त ही यह चिन्तन किया था। गिरिराज योनिजा और तपोव्रत से रहित हैं। मैं बलपूर्वक इसको पकड़ने की कैसी इच्छा कर रहा हूँ और क्यों संगम की कामना करने वाला हो गया हूँ। तप के व्रत से पवित्र अंगों वाली और तप के समाचरण से संस्कृत सती को दाक्षायणी की ही भाँति मैं स्वयं ही ग्रहण कर लूँगा। मैं इस समय में इच्छा न करते हुए भी विकारयुक्त कामवासना वाला हो गया हूँ। मैं किसी के द्वारा संगमोद्भव करने की इच्छा वाले से समाकृष्ट हो गया हूँ। इस प्रकार से इन्द्रिय के विकार के हेतु की खोज करते हुए उन्होंने बाण को संहित किए हुए कामदेव को देखा था। इसी बीच में ब्रह्मा जी समय को विज्ञात करके सुरों को देखकर अनुग्रह से अपने स्थान से उस बाण समागत हो गये। इसके अनन्तर का सन्धान किये हुए कामदेव को देखकर के शम्भु अधिक कुपित हो गये थे। वे अग्नि के समान ही प्रज्वलित हो गये थे और सबको बलपूर्वक दग्ध कर देने की इच्छा वाले हो गये थे। यह काम समय का ज्ञान करने मुझको मोहित करने की इच्छा करता है। मेरे मन को अपने वश में करना चाहता है इसलिए इसको यम को पहुँचाता हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते हुए भगवान् शम्भु के नेत्र से उपजा तेज से जो कि बढ़ रहा था उसने अग्नि