भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 442 में से

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पृष्ठ 255

ब्रह्माजी सागर पर गमन कर वहाँ परिपूजित होते हुए बोले-हे विप्रेन्द्रो! महेश का क्रोध बड़कावा स्वरूप धारण करने वाला होवे और तुमको जब तक मैं विनय न करूँ तब तक ज्वालामुखी होकर सदा कार्य करना चाहिए। हे सरिताओं के स्वामिन्! जिस समय मैं समागत होकर कहूँ उस समय इस बड़वामुख क्रोध का आपको परित्याग करना चाहिए। आपका जल ही इसका भोजन होगा कि इसको यत्नपूर्वक नाप के धारण करना चाहिए कि यह किसी अन्तर को प्राप्त न होवे। इस तरह से ब्रह्मा के द्वारा कहे हुए सिन्धु ने उस समय उस क्रोध को अंगीकार कर लिया था। भगवान् शम्भु का अशक्य भी क्रोध को बड़वा के मुख में ग्रहण करने के लिए बड़वा का मुखपात्रक जलधि में प्रविष्ट हो गया था। ज्वाला की मालाओं से अत्यन्त दीपित उस अग्नि ने जल के समूहों का भली भाँति दाह करते हुए जिस समय में वह शम्भु के नेत्र से अद्भुत हुआ था उसी समय में उसने कामदेव को दग्ध कर दिया था। उस महान् शब्द से काम का दाह क्षण भर में करने वाले से समस्त आकाश परिपूरित हो गया था। ऐसा ही महान् शब्द उस समय में हुआ था। उस समय काली अपनी सखियों सहित शोक से संयुत होकर बहुत ही अधिक भयभीत हो गई थी। उस शब्द से हिमवान् भी अतीव विस्मित और चकित हो गया था। वह हिमवान् शीघ्र ही भगवान् शम्भु के आश्रम में गई हुई अपनी पुत्री काली के समीप गया। वहाँ पर पुत्री को भय और शोक से व्याकुल रुदन करती हुई अचलराज ने देखा जो शम्भु के विरह से बहुत ही आकुल हो रही थी। उस शोकाकुल दशा में अपनी पुत्री के समीप पहुँच कर हिमाचल ने अपने हाथ से उसके दोनों नेत्रों का मार्जन करते हुए कहा था-हे कालि! डरो मत और रुदन भी मत करो। यह कहकर उसको ग्रहण कर लिया था। अचलों के राजा हिमवान् उस अपनी पुत्री को अपनी गोद में बिठाकर अपने घर ले आये और उसको सान्त्वना दी। भगवान् शम्भु के अन्तर्धान हो जाने पर उनके विरह से युक्त होती