कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८३ २६९ ईश्वर ने कहा- समस्त जगतों की भलाई के लिए तथा अपने आपको सम्भोग करने के लिए एवं सन्तान की वृद्धि के हेतु मैं दाराओं के ग्रहण करने की इच्छा करता हूँ। इस समय में आप लोग मेरी सहायता कीजिए और मेरे लिए आप लोग तुहिनाचल से काली की याचना करिए। काली महान् तप के द्वारा शीघ्र ही मुझ को अपना पति प्राप्त करे, किन्तु मैं उसको विधिपूर्वक ही ग्रहण करूँगा। इस कारण से उस गिरिराज से याचना करें। जिस तरह से शैलराज स्वयं काली को प्रदान करने का उत्साह करें। वैसे-वैसे आप करिए क्योंकि आप लोग तो वाणी के वैभव से समन्वित हैं अर्थात् बोलने में बहुत ही कुशल हैं। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-मुनि गण ने भगवान् हर का सम्बोधन किया फिर गिरिराज के गृह को चले गये थे। गिरिराज ने उनका अभ्यर्थन किया था फिर मुनियों ने गिरिराज से कहा कि जो मस्तक में चन्द्र धारण करने वाले देव हैं और जो देवों के भी देव माने गये हैं। जो शाप देने तथा अनुग्रह करने में समर्थ हैं। जो एक ही जगतों के स्वामी हैं। जो समस्त जगतों का प्रलय काल आने पर संहार किया करते हैं, जो भक्त को विभूति (वैभव) के प्रदान करने वाले और अनेक स्वरूपों के धारण करने वाले परम सुन्दर हैं। वे ही शंकर आपकी पुत्री को अपनी भार्या के रूप में ग्रहण करने की इच्छा कर रहे हैं। यदि आप उनको अपनी पुत्री के समान सुयोग्य वर देखते हो तो हे गिरिवर ! उन शम्भु के लिए अपनी पुत्री को दे दो। उनके द्वारा इस भाँति कहे हुए अचलराज अपने हृदय में स्थित दुहिता के प्रिय की चिरकाल पर्यन्त समझकर और सद्वचन से आनन्द प्राप्त करके फिर प्रकाश में यह कहा- हे मुनियो! में शार्दूल के ही समान अर्थात् परमाधिक श्रेष्ठ आप लोगों ने पधारकर ही मुझे पवित्र कर दिया है और आपने मेरा भी अभिप्राय परिपूर्ण कर दिया। आप लोगों ने जब मुझे आदेश दिया है तो मैं अपनी पुत्री को भगवान् शम्भु के लिए अवश्य ही समर्पित कर दूँगा। इसने पूर्व तपस्या का समाचरण करके