कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 282, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंघृत नन्दिकुण्ड को प्रणाम किया तथा जल्पिश देव को प्रणिपात किया था और फिर नाटक नामक पर्वत पर गमन किया था। वहाँ पर्वत पर पहुँच कर वृषभध्वज को प्रणाम किया और आराधना के उपदेश के लिए कपोत वचन का स्मरण किया था। फिर दोनों दक्षिण दिशा की ओर गए थे जहाँ सन्ध्याचल संस्थित था। वहाँ पर कान्ता नाम की नदी थी जो वशिष्ठ मुनि ने अवतारित की थी। उस नदी के तट पर एक महान शैल था जिस पर छाया वाले वृक्ष और लताएँ थीं क्योंकि ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ जी ने वहाँ पर सन्ध्या वन्दना की थी। इसीलिए देवगण उस पर्वत का नाम सन्ध्याचल गाया करते हैं वहाँ पर पहुँचकर वशिष्ठ मुनि का दर्शन किया था जो साक्षात् अग्नि के ही तुल्य थे। वे वशिष्ठ मुनि भगवान गिरीश की आराधना कर रहे थे और उनका मन ध्यान में संयुक्त था। वे तपस्या की श्री से देदीप्यमान थे और दूसरे सूर्य के ही समान प्रतीत हो रहे थे। उस अवसर पर उनके समक्ष वेताल और भैरव ने प्रणाम किया था। हे भूप! वे दोनों विनय से अवनत होते हुए हाथों को जोड़े हुए स्थित हो गए थे। उन दोनों ने यह प्रणाम करते हुए विधाता के पुत्र से कहा कि चन्द्रशेखर से हम दोनों तारावती में उत्पन्न हुए हैं। इस क्षेत्र में हम दोनों भर्ग पुत्रों को मनुष्य ही जानिए। हम कार्य की सिद्धि के लिए भगवान् शम्भु की आराधना करने की इच्छा रखते हैं। हे सुब्रत! आप हम दोनों के अभीष्ट के विषय में अनुग्रह करें। उन दोनों के उस वचन का मुनियों में श्रेष्ठ वशिष्ठ जी ने श्रवण किया और उन्होंने कहा था कि मैंने आप दोनों का ज्ञान प्राप्त कर दिया है और सत्य में आप दोनों ही भगवान् शम्भु के आत्मज हैं। हे नरश्रेष्ठ! आप दोनों को भगवान् शम्भु की आराधना करनी चाहिए। परमश्रेष्ठ आप दोनों यहाँ पर मेरा क्या कृत्य है यह बोलिए। वृषभराज की आराधना के लिए आप दोनों का प्रयोजन है। जो उसका निमित्त है वह सिद्ध हो गया है, वह चिन्तन कीजिए। वेताल और भैरव ने कहा-जिस मन्त्र के द्वारा अविलम्ब ही भली-भाँति भगवान् शम्भु की आराधना की गई