कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२ २९५ महामाया कल्प वर्णन श्री भगवान् ने कहा-इसके उपरांत 'लम्' इस मन्त्र के अर्घ्यपात्र का चतुष्कोण मण्डल शीघ्र ही बनाकर जो कि द्वार पद्म से वर्जित होवे । फिर 'ॐ ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र से मण्डल में अर्घ्यपात्र का विन्यास करना चाहिए । प्रथम वहाँ पूजा करके सन्निध्य करे । 'ॐ ह्रीं हौं' इस मन्त्र से गन्ध और पुष्प तथा जल अर्घ्यपात्र में क्षिप्त करे फिर वहाँ पर मण्डल का विन्यास करना चाहिए । पूर्व की ही भांति मण्डल करके अर्घ्यपात्र तीन भागों वाले जलों से पात्र को पूजित करें और उसमें पुष्प का निक्षेप करे । फिर ह्रीं, इस मन्त्र से आसन का जो कि अपना ही यजन करे । फिर बुद्ध पुरुष को चाहिए कि 'क्षौं', इस मन्त्र से आत्मा का पूजन करें । गन्ध, पुष्पों से शिरोदेश में पूजा का समाचरण करना चाहिए । 'ॐ सः'-इस मन्त्र के द्वारा हस्ततल में स्थित पुष्प का समाचरण करके सव्य कर से आघ्राण करके वाम कर के द्वारा कोविद पुरुष को ऐशानी दिशा में इसका पूर्व मन्त्र से ही विनिक्षेप करना चाहिए । रक्त वर्णन के पुष्प का ग्रहण करके दोनों हाथों से पाणिच्छप बाँधकर इसके पीछे दहन प्लवन आदि करे । बाँये हाथ की कनिष्ठका तथा दक्षिण हाथ की तर्जनी में वाम अंगुष्ठ को नियोजित करें । दाहिने उन्नत अंगुष्ठ को वाम कर के पृष्ठ में करना चाहिए । वाम के पितृ से मध्यमा और अनामिका को अधोमुख को और दाहिने कर को दक्षिण पृहस्त से कूर्म के पृष्ठ के समान करें । इस प्रकार से बँधा हुआ पाणिकच्छप सभी सिद्धियों को दे दिया करता है । स्थिर मन वाले बुद्ध पुरुष को चाहिए कि उसको अपने हृदय के समीप में करे और दोनों नेत्रों को मूँद लेवे । अपनी काया, शिर और ग्रीवा को समान रखे । फिर दाह प्लावन पूर्वक देवी के ध्यान का समारम्भ करना चाहिए । अग्नि को वायु में निक्षिप्त करके वायु को जल में और जल को हृदय में निक्षिप्त करे ।