कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें൵ श्रीकालिका पुराण ൵ ३३ करने के लिए न तो विष्णु समर्थ हैं और न लक्ष्मी तथा न कामदेव ही समर्थ हैं। हे जगत की माता ! मैं भी उनको मोहित करने की क्षमता नहीं रखता हूँ। इस कारण से आप ही महेश्वर को मोहित करिए। जिस प्रकार से भगवान् विष्णु की एक प्रिया हैं वैसे ही आप महेश्वर की होवें। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी से उस योगमयी ने फिर जो कहा था हे द्विजोत्तमो ! उसका श्रवण करिए । योगनिद्रा स्तुति देवी ने कहा-हे ब्रह्माजी ! आपने जो भी कहा था वह सम्पूर्ण सत्य ही है। मेरे बिना यहाँ पर शंकर को मोहित करने वाली कोई अन्य नहीं हैं। भगवान् हर के द्वारा न ग्रहण करने पर यह सनातनी सृष्टि नहीं होगी, यह तो आपने सर्वथा सत्य प्रतिपादन किया है। मेरे द्वारा भी इस जगत् के पति का महान् यत्न है। आपके वाक्य से आज दुगुना सुनिर्भर प्रयत्न हुआ था। मैं उस प्रकार से यत्न करूँगी कि भगवान् हर विवश होकर स्वयं ही विमोहित होकर दारा का परिग्रहण करेंगे। परम सुन्दर मूर्ति बनकर मैं उसी की वशवर्तिनी हो जाऊँगी। हे महाभाग ! जिस तरह से भगवान् विष्णु की वशवर्तिनी हरि प्रिया रहा करती हैं। उसी तरह से वह भी यहां पर मेरे ही साथ वशवर्ती हो जावें और मैं उसी तरह से करूँगी और हर को अपना वशवर्ती बना लूँगी जैसे अन्य साधारण जन को कर लिया जाता है। प्रतिसर्ग के आदि, मध्य उन निरंकुश शम्भु को, हे विज्ञ! विशेष रूप से स्त्री रूप से उनके समीप मैं जाऊँगी। हे पितामह ! दक्ष प्रजापति की स्त्री से बहुत ही सुन्दर स्वरूप से उत्पन्न हुई प्रतिसर्ग समाहित होऊँगी। इसके अनन्तर देवगण जगत्मयी विष्णुमाया मुझको रुद्राणी, शंकरी इस नाम से कहेंगे। उत्पन्न मात्र से ही निरन्तर जिस प्रकार से प्राणी को मोहित करूँ ठीक उसी भाँति से प्रमथों के स्वामी भगवान् शंकर को सम्मोहित कर लूँगी। भूमण्डल में जैसे अन्य साधारण जन वनिता के वश में हो जाया करता है उससे भी