भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

४०२ श्रीकालिका पुराण ४०२ ३२५ प्रान्तादि पञ्चम वह्निबीज षष्ठ स्वर से आहित तथा उपांत वाग्भव दुर्गा बीज कहा जाता है । स्थण्डिल, जलती हुई अग्नि, जल सूर्य की किरणों, और शुद्ध प्रतिमाओं में तथा शालग्राम की शिलाओं में, शिवलिंग में, शिला में विभूति के लिए पूजा करना चाहिए । एकाग्रमन वाला होकर सभी जगह मण्डल का न्यास करे । योगपीठ के बीज से स्थण्डिल आदि में साधक वासुदेव भगवान्, रुद्र देव, ब्रह्माजी की और सूर्य की पूजाओं में सर्वत्र बुद्ध पुरुष को यह प्रतिपत्ति करनी चाहिए । इस प्रकार से इन प्रतिपत्तियों से जो विष्णु भगवान् की पूजा करे तो उसको भगवान् हरि अविलम्ब ही चार वर्गों के प्रदाता हो जाया करते हैं । शिव हों या मिहिर हों जो भी अन्य प्रभृति होवे सभी सुरगण इस विधि में प्रसन्न हो जाया करते हैं विशेष रूप से जगन्मयी महामाया महादेवी प्रसन्न होती हैं । महामाया महादेवी इस प्रतिपत्ति का नित्य ही पूजन में चाहती रहती हैं । इस प्रकार से जो भी कोई भी पूजा किया करता है वह सम्यक फल का भागी होता है । इनसे विहीन जो भी पूजा होती है उससे अल्प से भी अल्प फल हुआ करता है । यह परम रहस्य है और परमाधिक कल्याण का अयन है । मन्त्र वेदों से परिपूर्ण और शुद्ध समस्त पापों का विनाश करने वाला होता है । जो इसका ब्राह्मणों के सन्निधान में श्रवण कराता है, श्राद्ध, यज्ञ, सुरों के पूजनों में इसको सुनाता है वह इस कर्म का बहुत अच्छा फल प्राप्त करता है । वह पूजा के बिना भी अनन्त का लाभ करता है । देवी तन्त्र कथन श्री भगवान् ने कहा-आप दोनों ही भली भाँति देवी के तन्त्र का श्रवण करिए जिसके द्वारा आराधना की हुई देवी शीघ्र ही फल प्रदायक हो जाया करती है । पूर्व में दिए हुए तन्त्र से विशेष रूप से यह निश्चय ही उत्तम तन्त्र है । सामान्यतया से यह पहले आपके आगे कहा गया है । फिर देवी की पूजा में भक्ति कर्म में विशेष रूप से जो