कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३४१ इक्षुदण्ड, सिता (मिश्री) लवली आदि नागरंजक, अजा, महिर्ष, मेष अपने शोणित के सञ्चय, अक्षी आदि बलि के जाति वाले तथा अनेक प्रकार के पशुगण के द्वारा तथा माँस और रुधिर के कर्दम के द्वारा जगत् की धात्री का पूजन करना चाहिए । रात्रि में स्कन्द विशाख की पिष्ठ पुत्रिका बनाकर शत्रुओं के विनाश के लिए दुर्गा की प्रीति के सम्पादन के वास्ते पूजन करे और तिलों के सहित घृत से तथा माँस से ही होम करना चाहिए । उग्र चण्डादिकं की पूजा करनी चाहिए तथा आठ शुभ योगिनियों की अर्चना करे । योगिनियाँ चौंसठ हैं । देवी के सन्निहित परम शुभ नव दुर्गाओं का यजन करे । जयन्ती आदि का गन्ध पुष्पों से पूजन करे क्योंकि वे देवी की मूर्तियाँ हैं और देवियाँ हैं । देवी के समस्त अस्त्र तथा सब भूषण जो देवी के अंग प्रत्यंग में युक्त हैं और देवी के वाहन सिंह का पूजन करना चाहिए । महिषासुर के मर्दन करने वाली सब का सदा भूति-वैभव के लिए यजन करे । पहले कल्प में स्वायम्भुव, मनु के अन्तर में मनुष्यों के कृतयुग के आदि काल में महादेवी सदा देवगणों के द्वारा स्तवन की गई थी । महिषासुर के विनाश के लिए तथा जगन्मयी महामाया प्रसिद्ध थी । वह महामाया सोलह भुजाओं से संयुत थी और भद्रकाली, इस नाम से लोकों में विश्रुत थी । क्षीर सागर के उत्तर पूर्वी तट पर अपने विपुल तनु का धारण करती हुई थीं । उनका वर्ण अलसी के पुष्प की आभा के ही समान था और उनके कुण्डल तपे हुए सुवर्ण के समान देदीप्यमान थे । खण्ड चन्द्र से युक्त उनके मस्तक पर कुण्डल जटाजूट थे तथा तीन मुकटों से यह शोभायमान था । उनके कण्ठों में नागों का हार विराजमान था तथा सुवर्ण का भी हार पड़ा हुआ था जिससे वे विभूषित हो रही थी । दाहिनी ओर की बाहुओं के द्वारा वे शूल, चक्र, खंड, शंख, बाण, शक्ति, वज्रदण्ड नित्य ही निरन्तर धारण कर रही थीं । देवी विकास संयुत दर्शनों की पंक्तियों से परम समुज्जवल थीं । बाँई ओर वाली भुजाओं के द्वारा वे खेटक, चर्म, चाप, पाश, अंकुश,