भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 442 में से

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पृष्ठ 353

३५६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ करने वाला है । समाप्ति के सहित दन्त्य है और उसके आगे रहने वाला प्रान्त होता है । छठवें स्वर अग्नि और बिन्दु के सहित होता है तथा आदि के भी सहित होता है । यह काली का मन्त्र बताया गया है । यह धर्म, काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है । अब इसकी मूर्ति का वर्णन करूँगा । हे वत्स! तुम एकाग्रमन वाले होकर उसका श्रवण करिए । वह नीलकमल से समान श्याम वर्ण वाली है और चार बाहुओं से समन्वित उनका वपु है । वह अपने दाहिने कर में खट्वांग और चन्द्रहास को धारण करने वाली है । वाम कर में पुनः ऊर्ध्व और अधो भाग में चर्म और पाश को धारण किए हुए हैं । कण्ठ में नरमुण्डों की माला पहने हुए हैं और व्याघ्र के चर्म को धारण करने वाली परम श्रेष्ठ हैं । उनका अंग कृश हैं और लम्बी दाढ़ों वाली है तथा अत्यन्त दीर्घ अर्थात् लम्बी एवं अत्यन्त भीषण स्वरूप से समन्वित है । उनकी जिह्वा अतीव चंचल है, निम्न रक्त वर्ण वाले नेत्रों से संयुत है, उनका महान् भैरव नाद है । मृत मनुष्य के धड़ को वाहन बनाकर उपविष्ट है और उनके श्रवण तथा मुख विस्तार वाले हैं । इस प्रकार के स्वरूप से सम्पन्न यह तारा देवी है और यह चामुण्डा, इस नाम से गान की जाया करती हैं । इस देवी की आठ योगिनियाँ हैं यदि उनका यजन एवं ध्यान किया जावे । उनके ये शुभ नाम हैं, त्रिपुरा, भीषण, चण्डी, कर्त्री, विधायनी, कराला और शूलिनी, ये आठ के कीर्त्तित की गई हैं । यह देवी अतिकाम की हानि करने वाली है । उस देवी के समान कोई भी कामनाओं के देने वाली नहीं है । यह देवी कौशिकी के हृदय से निकली हैं । यह देवी शिवदूती नाम से प्रसिद्ध है और सैंकड़ों देवों से सर्वदा समावृत रहा करती है । अब मैं इसका मन्त्र बताऊँगा जो धर्म काम और अर्थ का प्रदान करने वाला है और मनुष्य अविलम्ब ही समस्त कामनाओं की प्राप्ति कर लिया करता है और सब विजय प्राप्त कर लेने वाला हो जाता है । अन्त समाप्ति के सहित है और बिन्दु तथा इन्दु से दशावर है । उपान्त्य स्वर से अन्त से पूर्व में संम्पृष्ट होता है । वह

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