कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ें६८९ श्रीकालिका पुराण ६८९ ४०७ देव पूजा के अन्य उपचार श्री भगवान् ने कहा-कपास का अर्थात् सूत निर्मित, कम्बल, वल्कल अर्थात् छाल से रचित और कोशज वस्त्र ही अभीष्ट हुआ करता है । उसको ही पूर्व में मन्त्रों के द्वारा पूजन करके देवों के लिए उत्सृजित करना चाहिए । कीड़ों के द्वारा कटा तथा कुतरा हुआ मैला, जीर्ण, छिन्न और गाय से अर्वालंगित अर्थात् अंग पर धारण किया हुआ और चूहों के द्वारा काटा हुआ, सुई से विद्ध तथा उषित, गुप्त केश और विधोत एवं श्लेष्मा, मूत्र आदि से दूषित देवताओं के लिए प्रदान में और दैव तथा पित्रकर्म में वर्जित कर देना चाहिए । पताका और ध्वजा तथा कुण्डाडि में सिले हुए वस्त्र का प्रयोग करना चाहिए । और अन्यत्र आवरणादि में उसके विनाश के होने से रक्त वस्त्र और कौशेय वस्त्र महादेव के लिए उत्सृजन करना चाहिए । परमात्मा शिव के लिए रक्तवर्ण का कम्बल समर्पित करे । समस्त देवों के लिए देवियों के लिए विचित्र वस्त्र का निवेदन करना चाहिए । कपास का सर्वतोभद्र सभी के लिए निवेदित करे । बहुत ही लाल वस्त्र भगवान् वासुदेव के लिए नहीं निवेदन करना चाहिए । नील और रक्त जो भी वस्त्र है वह सभी जगह पर विशेष रूप से वर्जित कर देना चाहिए । जो बुध पुरुष प्रसाद से नील अथवा रक्त वस्त्र को भगवान् विष्णु के लिए निवेदित करता है हे भैरव! उसकी वह पूजा निष्फल ही हुआ करती है । विचित्र वस्त्र में जो कोई नीले वर्ण की विरंज्जित हुई हो तो ऐसे वस्त्र को महादेव के लिए निवेदित करना चाहिए । अन्य किसी देवता को कभी भी निवेदित न करे । जिस रीति से दो पदों वालों में ब्राह्मण और देवों में इन्द्रदेव होते हैं । उसी भाँति भूषण वर्गों में उत्तम कहा जाया करता है । वस्त्र से लज्जा जीर्ण होती है और वस्त्र के द्वारा पाप हीन अर्थात् नष्ट हो जाता है, वस्त्र से सभी प्रकार की सिद्धि होती हैं अतः वस्त्र चारों वर्गों के फल का प्रदान करने वाला होता है । हे पुत्र! आपके सामने यह वस्त्र सब प्रीति का देने वाला कह दिया गया है । अब भूषणों के विषय में मुझ से श्रवण करो ।