भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 442 में से

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६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३ ४२९ ही उस चन्द्रशेखर के पुत्र का सेवन किया था। उस भगवान् शंकर के पुत्र ने उस कामधेनु में परम आनन्द की प्राप्ति की थी और उसने भी उससे आनन्द को प्राप्त करके बहुत ही हर्षित हुई थी। उन दोनों में सुरत क्रीड़ा में प्रवृत्त हो जाने पर गर्भ स्थित हो गया था। जब प्रसव काल मै प्राप्त हुआ तो उस समय में उसने महावृष को प्रसूत किया था। वह थोड़े ही समय में सुमहान् वृषभ हो गया था। उसके बहुत बड़ा ककुद था और सुन्दर सींगों से वह युक्त था। उत्क्षेपण करके विचलित दोनों कानों वाला था और बहुत लम्बी उसकी पूँछ थी। वह ककुद् से, सीगों से और कानों से सितअभ्र के ही समान था। विचलन करते हुए उस शृंगों से सिताचल की ही भाँति देवों के द्वारा वह देखा गया था। बेताल ने उसका नाम शृंग, यही रखा था। यह शृंग बहुत ज्ञानवान् था और उसने ईश्वर की समाराधना की थी। वह भगवान् शम्भु भी उस पर परम तुष्ट हो गए थे और उसने अभीष्ट वरदान दिया था। भगवान् हर ने उसे वृषभ शरीर वाला बनाकर अपना वाहन बना लिया था। वह बल वाला और चिरायु था तथा पृथ्वी के धारण करने में समर्थ था। शृंग महान् तेज वाला था और वह प्रभु का केतु भी हो गया था क्योंकि शृंग होकर वह महान् आत्मा वाले भगवान् शंकर का प्यारा हो गया था। अतएव शृंग, इस ख्याति को प्राप्त हो गया था। वह शृंग महादेव के ध्यान में समासक्त हो जाने पर कभी-कभी वरुण के गृह में गमन किया करता था। वहाँ पर भी सुरभि की जो पुत्रियाँ थी वे रूप और यौवन से सम्पन्न थी। ये उनके साथ खूबसूरत रूप धारण करके उनका सेवन किया करता था। वरुण के गृह में सभी लक्षणों से युक्त सुता उत्पन्न हुई थी। जो बहुत थीं इनकी सूति-प्रसूतियों से यह जगत् व्याप्त हो रहा है और उनसे यज्ञ प्रवृत्त हुआ करता है। आज्य से देव सन्तुष्ट हुआ करते हैं और आज्य में ही यज्ञ प्रतिष्ठित होते हैं। यह सम्पूर्ण स्थावर और जंगम अर्थात् चर अचर जगत् यज्ञाधान होता है। वह आज्य गौओं के अधीन है, इससे सभी कुछ गौ में ही स्थित

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