भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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§८ श्रीकालिका पुराण §८ ५५

इसी बीच में कामदेव उस समय में अभिप्राय के सहित हर की नेत्र मुख और व्यापार से चिन्हित प्राप्त करके विवर चाप का पुष्पहेति के द्वारा सन्धान करने वाला हो गया था । इसके अनन्तर हर्षण बाण के द्वारा उसने ( कामदेव ने ) हर के हृदय बेधन किया था । इसके उपरान्त हर्षित शम्भु ने फिर एक बार सती को देखा था । उस समय में परमेश्वर शिव ने परब्रह्म के चिन्तन को एकदम भुला ही दिया था । फिर इस कामदेव ने मोहनबाण के द्वारा भगवान् हर को बेधित किया था । तब हर्षित होकर शम्भु उस अवसर पर बहुत ही अधिक मोहित हो गये थे । हे द्विजोत्तमों! जब इन्होंने मोह और हर्ष को व्यक्त कर दिया था तो वह माया के द्वारा भी विमोहित हो गये थे । इसके अनन्तर सती ने अपनी लज्जा को स्तम्भित करके जिस समय में हर से वह बोली थी—हे वरद! मेरे अभीष्ट वर इस अर्थ को करने वाले को प्रदान करिए । उस समय में सती के वाक्य के अवसान की प्रतीक्षा न करके ही वृषभध्वज ने दाक्षायणी से पुनः 'मेरी भार्या हो जाओ' कहला दिया था । हर के यह वचन सुनकर जो अभीष्ट के फल का भावना से युक्त था वह सती मनोगत वर की प्राप्ति करके परम प्रमुदित होती हुई मौन होकर स्थित हो गयी थी । हे द्विजोत्तमो! कामवासना से समन्वित महादेवजी आगे वहाँ पर ब्रह्म चारुहास वाली सती ने अपने हावों और भावों से किया था । उस समय में अपने भावों का आदान-प्रदान करके शृंगार नामक रस ने उन दोनों में प्रवेश किया था । वे विप्रेन्द्रों! भगवान् हर के आगे स्निग्ध भिन्न अंजन की प्रभा से समान प्रभा वाली, स्फटिक के समान उज्ज्वल कान्ति वाले हर के सामने चन्द्रमा के समीप में अंकलेख की तरह राजित हुई थी । इसके अनन्तर दाक्षायणी पुनः उन महादेवजी से बोली थी—हे जगत्पते! मेरे पिता के सामने गोचर होकर मुझे ग्रहण कीजिए । उस समय में देवी सती ने इस प्रकार से जो स्मितयुक्त वचन कहा था कि 'मेरी भार्या हो जाओ' यह महादेव जी ने कहा था । इसके अनन्तर कामदेव यह देखकर रति और अपने मित्र