भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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से लेकर बारह अँगुल तक की प्रतिमा घर पर रखने का शास्त्रों का मत है । किन्तु इससे अधिक परिमाण की मूर्ति मन्दिर के लिए उत्तम कही गई है । काली देवी की प्रतिष्ठा माघ और आश्विन मास में उत्तम तथा समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली होती है । इन मासों में भी विशेष रूप से कृष्ण पक्ष में प्रतिष्ठा करना श्रेष्ठ माना गया है । श्री काली का स्वरूप काली देवी का वर्णश्याम है जिसमें सभी रंग सन्निहित हैं । भक्तों के विकार-शून्य हृदयरूपी शमशान में उनका निवास है । भगवती चित्तशक्ति में समाहिम प्राणशक्तिरूपी शव के आसन पर स्थित हैं । उनके ललाट पर अमृतत्व बोधक चन्द्रमा है और वे त्रिगुणातीत निर्विकार केशिनी हैं । सूर्य, चन्द्र और अग्नि ये तीनों उनके नेत्र हैं जिनसे वे तीनों कालों को देखती हैं । वे सतोगुण रूपी उज्ज्वल दाँतों से रजोगुण-तमोगुण रूपी जीभ को दबाये हुए हैं । सारे संसार का पालन करने में सक्षम होने के कारण वे उन्नत पीनपयोधरा हैं । वे पचास मातृका अक्षरों की माला धारण करती हैं।तथा मायारूपी आवरण से मुक्त हैं तथा सभी जीव मोक्ष न होने तक उनके आश्रित रहते हैं । वे निष्काम भक्तों के मायारूपी पाश को ज्ञानरूपी तलवार से काट देती हैं । वे कालरूपी शक्ति को वास्तविक शक्ति देने वाली विराट् भगवती हैं । इसके अतिरिक्त रक्तबीजमर्दिनी श्री काली का स्वरूप वर्णन इस प्रकार है- सम्पूर्ण विकराल देह चमकते हुए काले रंग की है । उनकी बड़ी-बड़ी डरावनी आँखें और मुख से जीभ को बाहर निकाले हुए हैं, जो गहरे लाल रंग की है । वह नरमुण्डों की माला तथा कटे हुए हाथों का आसन धारण किए हुए हैं । उनके एक हाथ में खड्ग, दूसरे में त्रिशूल, तीसरे में खप्पर तथा चौथे हाथ में भक्तों को आशीर्वाद प्रदान करती हैं ।