भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 442 में से

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पृष्ठ 69

७० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ॐ वह ही प्रधान रूप से और काल के स्वरूप से भासमान होता है तथा पुरुष के रूप में संसार के लिए प्रवृत्त हुआ करता है। भोग करने के लिए निरन्तर वह प्राणधारियों के शरीर में प्रवृत्तित होता है। वह ही माया या प्रकृति हैं जो शंकर भगवान् को मोहित करती है। वह ही हरि को और ब्रह्माजी को मोहयुक्त करती हैं। ठीक उसी भाँति से आप अन्य जन्म वाले हैं। माया के नाम वाली प्रकृति जात हुई और जन्तु को सम्मोहित भी किया करती है। वह सदा स्त्री के स्वरूप से लक्ष्मीभूता हुई हरि भगवान् की प्रिया है। वह ही सावित्री, रति, सन्ध्या, सती और वारिणी है। वह देवी स्वयं बुद्धि के रूप वाली है जो चण्डिका इन नाम से गायन की जाया करती है। यह ध्यान के मार्ग में गमन किए हुए भगवान् हर ने शीघ्र स्वयं ही देखा था। महत्तत्व आदि के भेद से फिर सृष्टि के क्रम को स्वयं देखा था। भगवान् ने काल-प्रकृति तथा पुरुषों को दिखलाकर हे द्विजोत्तभों! उसी प्रकार से उनके शरीर को अन्य दिखलाया था। हर कोप शमन वर्णन मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर भगवान् ने शम्भु के लिए ब्रह्माण्ड का संस्थान दिखलाया था जिस प्रकार से पहले ब्रह्माण्ड जो जल की राशि में स्थित होता हुआ बढ़ा था। उसके मध्य में पद्मगर्भ की आभा वाले जगत् के पति ब्रह्मा को जो ज्योति के रूप वाला प्रकाश के लिए और सृष्टि की रचना करने के लिए पृथक्गत है और शरीरधारी को देखा था। फिर ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत चार भुजाओं से समन्वित ज्योतियों से प्रकाशित कमल पर आसन वाले को देखा था और वहीं पर उन्होंने तीन भागों में स्थित वपु वाले ब्रह्मा को देखा था। जो ऊर्ध्व, मध्य और अन्त भागों के द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूप वाला था। जिस रीति से वायु का ऊर्ध्व भाग उस समय में ब्रह्मत्व को प्राप्त हो गया था जो मध्य भाग था। वह एक ही शरीर तीन भागों में बार-बार हर भगवान् ने अपने गर्भ में इस सम्पूर्ण जगत् को