कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ को धारण करता था । उस समय में चन्द्रमा के साथ प्रसन्न और तुषार से रहित विभावरी सुमनोहर कामिनियाँ प्रिय के साथ की भाँति की हो गयी थीं । उस समय महादेव उत्तम धरा में उत्तम सती के साथ बहुत समय तक होकर रमण करते रहे । हिमाद्रि निवास गमन मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर किसी समय में दक्ष की पुत्री सती ने जलदों के आगम में अद्रि (पर्वत) शिखर के प्रस्थ में संस्थित वृषभध्वज से बोली-मेघों के समागम का समय प्राप्त हो गया है । यह काल परम दुःसह होता है । अनेक वर्णों वाले मेघों के समुदाय से आकाश और दिशायें सब स्थगित अर्थात् आछन्न हो गये हैं । अत्यन्त वेग वाली वायु हृदय को विदीर्ण करती हुई वहन करती है । विद्युत की पताका वाले मेघों की ऊँची और तीव्र गर्जना से जो मेघधारा सार को मोचन कर रहे हैं, इससे किसके मन क्षुब्ध नहीं होते हैं अर्थात् सभी के मन में लोभ उत्पन्न हो जाया करता है । इस समय में सूर्य दिखलाई नहीं देता है और मेघों से चन्द्रमा भी समाच्छन्न हो गया था और इस समय में दिन भी रात्रि की भाँति प्रतीत होता है । यह समय विरही जनों को बहुत ही व्यथा करने वाला है । ये मेघ एक जगह में स्थित नहीं रहा करते हैं । ये गर्जन की ध्वनि करते हुए पवन से चलायमान हो जाते हैं । हे शंकर! ये ऐसे प्रतीत होते हैं मानों लोगों के माथे पर गिर रहे हों । वायु से हत हुए वृक्ष आकाश में नृत्य-सा करते हुए दिखलाई दिया करते हैं । हे हर! ये कामुक पुरुषों के ईक्षित हैं और भीरुओं को त्राण देने वाले हैं । स्निग्ध नीलअञ्जन के समान श्याम मेघों के ओघ के पीछे से बलकाओं की पंक्ति यमुना के धृष्ट फेन के ही समान शोभा देती है । यह गत कालिका क्षण-क्षण में चञ्चल है ऐसी दिखलाई दिया करती है । जैसे सागर में सन्दोप्त बड़वा मुख पावक होता है । मन्दिर के प्रांगणों में भी शस्य पुरुढ़ होते हैं । हे विरूपाक्ष! अन्य स्थान मे मैं