भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 442 में से

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पृष्ठ 87

८८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ थी। वह ऊपर की ओर भुजाओं को किए हुए विशेष क्रन्दन करती हुई कम्प से संयुत होती हुई भूमि पर गिर गयी थी। [दक्ष यज्ञ-भंग वर्णन] मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसी बीच में भगवान् शम्भु परम शोभन मानस हृद में सन्ध्या वन्दना को समाप्त करके आश्रम की ओर आये हुए थे। वृषभध्वज ने विजया के परम दारुण रूदन की ध्वनि को आते हुए ही श्रवण किया था और फिर वे चकित हो गये थे। इसके अनन्तर भगवान् शम्भु बलवान मन और मारुत के वेग से त्वरान्वित होकर शीघ्र ही अपने आश्रम के स्थान पर प्राप्त हो गए थे। उस समय में हर ने प्यारी दाक्षायणी देवी को मृता देखकर भी अत्यधिक प्रियभाव से मृत होने पर भी त्याग नहीं किया था। इसके उपरान्त मुख को देखकर और बार-बार आमृजन करके यह सोई है इसी प्रकार से दाक्षायणी से बार-बार कैसे पूछा था। इसके उपरान्त भर्ग के वचन का श्रवण करके उसकी बहन-पुत्री विजया ने जिस रीति से दाक्षायणी का निधन कहा था। विजया ने कहा-हे शम्भु! प्रजापति दक्ष के यज्ञ करने के लिए इन्द्र सहित सभी देवों को बुलाया था तथा दैत्यों, राक्षसों, सिद्धों और गुह्यकों को भी बुलाया था। ब्राह्मणों, श्री गोविन्द और इन्द्रादिक् पतियों को भी उस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए बुलाया था तथा देवयोनि को और समस्त साध्य तथा विद्याधरों को भी बुलाया था। हे शंकर! जो सत्व थे उसने उनको आहूत नहीं किया था जो कि समस्त भुवनों में भीं हैं। यह दाक्षायणी इस प्रकार से प्रवर्त्तित यज्ञ के विषय में श्रवण करके जो कि मेरे वचन से ही श्रवण किया था उसने भगवान् शम्भु का और अपने न बुलाने के हेतु के विषय में विचार किया था। मैंने जैसे भी सुना था उसी के अनुसार चिन्ता करती हुई उस सती का ज्ञान प्राप्त करके, हे भूतेश मैंने ही यज्ञ में न बुलाने का कारण कहा था। वह कारण यही था कि दक्ष ने सोचा था कि भगवान् शम्भु