कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें൵७२ श्रीकालिका पुराण ൵७३ ९१ संयुत तथा विद्युत् के सहित अन्य जलधरों को वहीं पर स्थित दिग्गजों को, जिनमें ऐरावत प्रमुख था भगवान् हर ने देखा था। यथास्थान पर दिक्करिणी से समन्वित सबको देखा था। महान् धन से संयुत उस यज्ञ को दूर ही से देखकर शिव ने वीरभद्र नामक गण को शीघ्र ही उसकी ओर प्रेषित किया था। वह वीरभद्र महागण भी बहुत से अनेक गणों संवृत हुआ था। उसने महात्मा दक्ष के यज्ञ का फिर ध्वंस कर दिया था। उस महान् यज्ञ के विध्वंस करते हुए वीरभद्र को देखकर समस्त देवगणों से आवृत भगवान् वैकुण्ठ ने वरण किया था। उनको निवारण करते हुए देखकर ही ईश्वर के लोचन क्रोध से लाल हो गये वे फिर ईश्वर स्वयं ही उस महायज्ञ में प्रविष्ट हो गये थे और उस यज्ञ का ध्वंस कर दिया था। भग आगे से ही उस यज्ञ में प्रवेश करते हुए उनको सर्वप्रथम देखकर अपनी बाहुओं को फैलाकर भगत्त्वरा से संयुत होकर भगवान् भूतेश के पास गया था। उसको सामने आते हुए देखकर भगवान् भर्ग भी अत्यन्त कुपित हो गये थे और अपनी अंगुलि के अग्रभाग के प्रहार से उन्होंने उस भग के नेत्रों का हनन कर दिया था। नेत्रों से हीन विरुपाक्ष भग को देखकर दिवाकर से त्वरायुक्त होते हुए स्पर्धा करने वाले भगवान् शर्व के समीप आये थे। इसके उपरान्त महादेव ने सूर्य को कर से पकड़कर हाथ से दूर हटाकर अत्यन्त क्रोध युक्त होकर उस यज्ञ की ओर ही धावमान हो गये थे। मार्त्तण्ड (सूर्य) हँसते हुए बड़े वेग के साथ दोनों बाहुओं को फैलाकर कहने लगा आओ, मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा। इतना कहकर सूर्य ने उस शिव को आगे चलकर फिर रोक दिया था। हँसते हुए उस सूर्य के दाँतों को वृषभध्वज ने क्रोधयुत होकर हाथ के ही प्रहार से मुख से गिरा दिया था। इस प्रकार से सूर्य को बिना दाँतों वाला तथा भग को हीन मन्त्रों वाला देखकर समस्त देवगण, ऋषि लोग और जो भी वहाँ पर अन्य थे वे सब भाग गये थे। भगवान् सब देवगण आदि को भागकर परमाधिक कोप वाले होते