कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४०२ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * व्याख्या—उन परमानन्दस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरके समीप यह सूर्य अपना प्रकाश नहीं फैला सकता, जिस प्रकार सूर्यके प्रकाशित होनेपर जुगनूका प्रकाश लुप्त हो जाता है, उसी प्रकार सूर्यका भी तेज वहाँ लुप्त हो जाता है । चन्द्रमा, तारागण और बिजली भी वहाँ अपना प्रकाश नहीं फैला सकते, फिर इस लौकिक अग्निकी तो बात ही क्या है ! क्योंकि इस जगत्में जो कोई भी प्रकाशशील तत्त्व है, वे उन परम प्रकाशस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तमकी प्रकाशशक्तिके किसी अंशको पाकर ही प्रकाशित होते हैं । फिर वे अपने प्रकाशकके समीप कैसे अपना प्रकाश फैला सकते हैं। अतः यही समझना चाहिये कि यह सम्पूर्ण जगत् उन जगदात्मा पुरुषोत्तमके प्रकाशसे ही प्रकाशित हो रहा है ॥ १४ ॥ एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥ अस्य = इस, भुवनस्य = ब्रह्माण्डके; मध्ये = बीचमें, ( जो ) एकः = एक; हंसः = प्रकाशस्वरूप परमात्मा ( परिपूर्ण है ), सः एव = वही, सलिले = जलमें, संनिविष्टः = स्थित, अग्निः = अग्नि है, तम् = उसे, विदित्वा = जानकर; एव = ही, ( मनुष्य ) मृत्युम् अत्येति = मृत्युरूप संसार-समुद्रसे सर्वथा पार हो जाता है, अयनाय = दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये, अन्यः = दूसरा, पन्थाः = मार्ग, न = नहीं, विद्यते = है ॥ १५ ॥ व्याख्या—इस ब्रह्माण्डमे जो एक प्रकाशस्वरूप परब्रह्म परमेश्वर सर्वत्र परिपूर्ण हैं, वे ही जलमें प्रविष्ट अग्नि हैं । यद्यपि शीतल स्वभावयुक्त जलमे उष्णस्वभाव अग्निका होना साधारण दृष्टिसे समझमें नहीं आता, क्योंकि दोनोंका स्वभाव परस्पर विरुद्ध है, तथापि उसके रहस्यको जाननेवाले वैज्ञानिकोंको वह प्रत्यक्ष दीखता है, अतः वे उसी जलमेंसे बिजलीके रूपमे उस अग्नितत्त्वको निकालकर नाना प्रकारके कार्योंका साधन करते हैं । शास्त्रोंमें भी जगह-जगह यह बात कही गयी है कि समुद्रमें बड़वानल अग्नि है । अपने कार्यमें कारण व्याप्त रहता है—इस न्यायसे भी जलतत्त्वका कारण होनेसे तेजस्तत्त्व का जलमें व्याप्त होना उचित ही है । किंतु इस रहस्यको न जाननेवाला जलमें स्थित अग्निको नहीं देख पाता । इसी प्रकार परमात्मा इस जड जगत्से स्वभावत' सर्वथा विलक्षण हैं, क्योंकि वे चेतन, ज्ञानस्वरूप और सर्वज्ञ हैं तथा यह जगत् जड और ज्ञेय है । इस प्रकार जगत्से विरुद्ध दीखनेके कारण साधारण दृष्टिसे यह बात समझमें नहीं आती कि वे इसमें किस प्रकार व्याप्त हैं और किस प्रकार इसके कारण है । परंतु जो उन परब्रह्मकी अचिन्त्य अद्भुत शक्तिके रहस्यको समझते हैं, उनको वे प्रत्यक्षवत् सर्वत्र परिपूर्ण और सबके एकमात्र कारण प्रतीत होते हैं । उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको जानकर ही मनुष्य इस मृत्युरूप संसारसमुद्रसे पार हो सकता है—सदाके लिये जन्म मरणसे सर्वथा छूट सकता है । उनके दिव्य परमधामकी प्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। अतः हमें उन परमात्माका जिज्ञासु होकर उन्हें जाननेकी चेष्टामें लग जाना चाहिये ॥ १५ ॥ सम्बन्ध—जिनको जाननेसे जन्म-मरणसे छूटनेकी बात कही गयी है, वे परमेश्वर कैसे हैं—इस जिज्ञासापर उनके स्वरूपका वर्णन किया जाता है— स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥१६॥ सः = वह, ज्ञः = ज्ञानस्वरूप परमात्मा, विश्वकृत् = सर्वस्रष्टा, विश्ववित् = सर्वज्ञ, आत्मयोनिः = स्वयं ही अपने प्राकट्य- का हेतु, कालकालः = कालका भी महाकाल, गुणी = सम्पूर्ण दिव्यगुणोंसे सम्पन्न, (और ) सर्ववित् = सबको जाननेवाला है यः = जो; प्रधानक्षेत्रज्ञपतिः = प्रकृति और जीवात्माका स्वामी, गुणेशः = समस्त गुणोंका शासक, ( तथा ) संसारमोक्ष- स्थितिबन्धहेतुः = जन्म-मृत्युरूप संसारमें बाँधने, स्थित रखने और उससे मुक्त करनेवाला है ॥ १६ ॥ व्याख्या—जिनका प्रकरण चल रहा है, वे ज्ञानस्वरूप परब्रह्म पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले, सर्वज्ञ और स्वयं ही अपनेको प्रकट करनेमें हेतु हैं । उन्हें प्रकट करनेवाला कोई दूसरा कारण नहीं है। वे कालके भी महाकाल हैं, कालकी भी उनतक पहुँच नहीं है। वे कालातीत हैं। कठोपनिषद्में भी कहा है कि सबका संहार करनेवाला मृत्यु उन महाकालरूप परमात्मा- का उपसेचन—खाद्य है ( कठ० १।२।२४ ) । वे सर्वशक्तिमान् परमेश्वर सौहार्द, प्रेम, दया आदि समस्त कल्याणमय दिव्य गुणोंसे