भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 440

४१२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय १


बोले--'पहले आप दोनो पूज्यजन बातचीत आरम्भ करें। उपदेश देते हुए आप दोनों ब्राह्मणोंके वचनोंको मैं सुनूँगा।' यों कहकर वे चुप हो गये ॥ १-२ ॥

कहा जाता है, तब वे शालावान्के पुत्र शिलक ऋषि चिकितायनके पुत्र दाल्भ्यसे बोले--'कहिये तो मै ही आपसे प्रश्न करूँ?' इसपर दाल्भ्यने कहा--'पूछो।' शिलकने पूछा--'सामका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर ही सामका आश्रय है।' 'स्वरका आश्रय कौन है?' इस प्रकार पूछे जानेपर उन्होंने कहा--'प्राण ही स्वरका आश्रय है।' फिर प्रश्न हुआ--'प्राणका आश्रय कौन है?' उत्तर मिला--'अन्न ही प्राणका आश्रय है।' शिलकने फिर प्रश्न किया--'अन्नका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने उत्तर दिया--'जल ही अन्नका आश्रय है।' शिलकने पुनः पूछा--'जलका आश्रय कौन है?' दाल्भ्यने कहा--'स्वर्गलोक ही जलका आश्रय है।' 'उस लोकका आश्रय कौन है?' शिलक पूछते ही गये। इसपर दाल्भ्य बोले--'स्वर्गलोकसे आगे नहीं जाना चाहिये, उसके परेकी बात नहीं पूछनी चाहिये। हम स्वर्गलोकमे ही सामकी पूर्णतया स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको स्वर्गलोक कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है'* ॥ ३-५ ॥

चिकितायन-पुत्र दाल्भ्यसे शालावान्के पुत्र सुप्रसिद्ध शिलक ऋषिने कहा--'दाल्भ्य ! तुम्हारा बताया हुआ साम निःसन्देह प्रतिष्ठाहीन है अर्थात् तुमने जो सामका अन्तिम आश्रय स्वर्ग बताया, वह ठीक नहीं है। स्वर्गका भी कोई और आश्रय अवश्य होना चाहिये। यदि कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला विद्वान् तुम्हारे इस अधूरे उत्तरपर झुंझलाकर तुम्हें यह कह दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा, तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर पड़ेगा--यह निश्चय समझो।' दाल्भ्यने कहा--'क्या मै सामका तत्त्व श्रीमान्से जान सकता हूँ?' शिलकने कहा--'हाँ, जानो।' तब दाल्भ्यने पूछा--'स्वर्गलोकका आधार कौन है?' 'यह मनुष्यलोक ही उसका आधार है,' शिलकने स्पष्ट उत्तर दिया। 'मनुष्यलोकका आधार कौन है?' दाल्भ्यका अगला प्रश्न था। इसपर शिलक बोले--'जो सबकी प्रतिष्ठा है, उस लोकमे आगे प्रश्न नहीं करना चाहिये। सबकी प्रतिष्ठारूप मनुष्यलोकमे ही हम सामकी भलीभाँति स्थिति मानते हैं, क्योंकि सामको सबकी प्रतिष्ठारूप पृथ्वी कहकर ही उसकी स्तुति की जाती है।'† तब जीवला-पुत्र प्रवाहणने शिलकसे कहा--'शालावान्के पुत्र शिलक ! तुम्हारा समझा हुआ साम भी निःसन्देह अन्तवाला ही है। अत यदि ऐसी स्थितिमें कोई सामके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष तुम्हे शाप दे दे कि तुम्हारा सिर गिर जायगा तो उसके यों कहते ही तुम्हारा सिर गिर सकता है।' इसपर शिलकने कहा--'क्या मैं इस रहस्यको श्रीमान्से जान सकता हूँ ?' प्रवाहणने उत्तर दिया--'जान लो' ॥ ६-८ ॥


नवम खण्ड

उद्गीथके सम्बन्धमें शिलक और प्रवाहणका संवाद

शिलकने प्रवाहणसे पूछा--'इस मनुष्यलोकका आश्रय कौन है?' इसपर प्रवाहणने उत्तर दिया--'आकाश अर्थात् सर्वत्र प्रकाशित परमात्मा ही इसके आश्रय हैं। निःसदेह ये समस्त जीव आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं और आकाशमें ही विलीन होते हैं; क्योंकि आकाश ही इन सबसे बड़ा है और आकाश ही सबका परम आश्रय है। वे आकाशस्वरूप परमात्मा ही बड़े से-बड़े और उद्गीथ (गानेयोग्य) हैं। वे सर्वथा असीम हैं। जो कोई उपासक इस प्रकार समझकर इस बड़े-से बड़े उद्गीथरूप परमेश्वरकी उपासना करता है, उसका जीवन निःसन्देह ऊँचे-से-ऊँचा हो जाता है और वह निश्चय ही बड़े-से-बड़े लोकोंको जीत लेता है--प्राप्त कर लेता है।' एक बार शौनकके पुत्र अतिधन्वा नामक ऋषिने उदरशाण्डिल्य नामके ऋषिको इस ऊपर बताये हुए उद्गीथका रहस्य बताकर कहा था--'तेरी संतानोंमे लोग जबतक इस उद्गीथको जानते रहेंगे, तबतक इस लोकमें उनका जीवन इन सब साधारण मनुष्योंसे अवश्य ही अत्यन्त श्रेष्ठ बना रहेगा। तथा मरनेके बाद उन्हें उस लोकमे--परलोकमे उत्तम स्थान मिलेगा।' इस प्रकार समझना चाहिये। इस रहस्यको जाननेवाला जो कोई पुरुष उद्गीथकी उपासना करता है, उसका जीवन इस मनुष्यलोकमें निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ हो जाता है। तथा मरनेके बाद परलोकमें उसे सर्वोपरि स्थान मिलता है--यह निश्चित बात है ॥ १-४ ॥


* श्रुति कहती है--'स्वर्गो वै लोक सामवेद ।' † श्रुतिका वचन है--'इयं वै रथन्तरम्' (यह पृथ्वी ही रथन्तरसाम है)।