भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 444

४१६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय २ षष्ठ खण्ड पशुओंमें सामोपासना पशुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । बकरे वाला पुरुष पशुओंमे पाँच प्रकारके सामकी उपासना हिंकार हैं, भेड़ें प्रस्ताव है, गौएँ उद्गीथ है, अश्व प्रतिहार करता है उसे पशु प्राप्त होते ह और वह पशुमान् हैं और पुरुष निधन है। जो इसे इस प्रकार जानने- होता है ॥ १-२ ॥ सप्तम खण्ड प्राणोंमें सामोपासना प्राणोंमें पाँच प्रकारकेपरोवरीय गुणविशिष्ट सामकी उपासना वाला पुरुष प्राणोंमे पाँच प्रकारके उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर सामकी करे। उनमें प्राण हिंकार है, वाक् प्रस्ताव है, चक्षु उद्गीथ है, उपासना करता है उसका जीवन उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर होता जाता श्रोत्र प्रतिहार है और मन निधन है। ये उपासनाएँ निश्चय ही है और वह उत्तरोत्तर उत्कृष्टतर लोकोंको जीत लेता है। यह परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) हैं। जो इसे इस प्रकार जानने- पाँच प्रकारकी सामोपासनाका निरूपण किया गया ॥ १-२ ॥ अष्टम खण्ड वाणीमें सप्तविध सामोपासना अब सप्तविध सामकी उपासना [ प्रारम्भ की जाती ] 'उप' ऐसा शब्द है वह उपद्रव है और जो कुछ 'नि' ऐसा है—वाणीमें सप्तविध सामकी उपासना करनी चाहिये । वाणीमें शब्दरूप है वह निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला जो कुछ 'हुं' ऐसा स्वरूप है वह हिंकार है, जो कुछ 'प्र' पुरुष वाणीमें सात प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे ऐसा स्वरूप है वह प्रस्ताव है और जो कुछ 'आ' ऐसा स्वरूप वाणी, जो कुछ वाणीका दोह (सार) है उसे देती है तथा है वह आदि है, जो कुछ 'उत्' ऐसा शब्दरूप है वह उद्गीथ वह प्रचुर अन्नसे सम्पन्न और उसका भोक्ता होता है ॥१-३॥ है, जो कुछ 'प्रति' ऐसा शब्द है वह प्रतिहार है, जो कुछ नवम खण्ड आदित्य-दृष्टिसे सप्तविध सामोपासना अब निश्चय ही इस आदित्यकी दृष्टिसे सप्तविध सामकी अनुगत पक्षिगण है। क्योंकि वे इस सामके आदिका भजन उपासना करनी चाहिये । आदित्य सर्वदा सम है, इसलिये करनेवाले हैं, इसलिये वे अन्तरिक्षमे अपनेको निराधाररूपसे वह साम है। मेरे प्रति, मेरे प्रति ऐसा होनेके कारण वह सब ओर ले जाते हैं। तथा अब जो मध्यदिवसमें आदित्यका सबके प्रति सम है, इसलिये साम है। उस आदित्यमें ये रूप होता है वह उद्गीथ है। इसके उस रूपके देवता लोग सम्पूर्ण भूत अनुगत हैं—ऐसा जाने । जो उस आदित्यके अनुगत हैं। इसीसे वे प्रजापतिसे उत्पन्न हुए प्राणियोंमें उदयसे पूर्व है वह हिंकार है। उस सूर्यका जो हिंकाररूप है सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि वे इस सामकी उद्गीथभक्तिके भागी है। उसके पशु अनुगत हैं, इसीसे वे हिंकार करते हैं। अत वे ही तथा आदित्यका जो रूप मध्याह्नके पश्चात् और अपराह्नके पूर्व इस आदित्यरूप सामके हिंकार भाजन हैं। तथा सूर्यके पहले- होता है वह प्रतिहार है। उसके उस रूपके अनुगामी गर्भ पहल उदित होनेपर जो रूप होता है वह प्रस्ताव है। उसके हैं। इसीसे वे ऊपरकी ओर आकृष्ट किये जानेपर नीचे नहीं उस रूपके मनुष्य अनुगामी हैं अत वे प्रस्तुति (प्रत्यक्षस्तुति) गिरते, क्योंकि वे इस सामकी प्रतिहारभक्तिके पात्र हैं। तथा और प्रशांस (परोक्षस्तुति) की इच्छावाले हैं, क्योंकि वे आदित्यका जो रूप अपराह्नके पश्चात् और सूर्यास्तसे पूर्व होता इस सामकी प्रस्तावभक्तिका सेवन करनेवाले हैं। तत्पश्चात् है वह उपद्रव है। उसके उस रूपके अनुगामी वन्य पशु है। आदित्यका जो रूप सङ्गववेलामें (सूर्योदयके तीन मुहूर्त इसीसे वे पुरुषको देखकर भयवश अरण्य अथवा गुहामें भाग पश्चात् कालमे) रहता है वह आदि है। उसके उस रूपके जाते हैं, क्योंकि वे इस सामकी उपद्रवभक्तिके भागी हैं।