कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ
चतुर्थ अध्याय
प्रथम खण्ड
राजा जानश्रुति और रैक्वका उपाख्यान
जो श्रद्धापूर्वक देनेवाला एव बहुत दान करनेवाला था और जिसके यहाँ [ दान करनेके लिये ] बहुत सा अन्न पकाया जाता था ऐसा कोई जनश्रुतके कुलमें उत्पन्न हुआ उसके पुत्रका पौत्र था। उसने, इस आशयसे कि लोग सब जगह मेरा ही अन्न खायेंगे, सर्वत्र निवासस्थान ( धर्मशालाएँ ) बनवा दिये थे ॥ १ ॥
उसी समय [ एक दिन ] रात्रिमे उधरसे हंस उड़कर गये। उनमेसे एक हंसने दूसरे हंससे कहा—'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष ! देख, जानश्रुति पौत्रायणका तेज द्युलोकके समान फैला हुआ है; तू उसका स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर डाले।' उससे दूसरे [अग्रगामी] हंसने कहा—'अरे ! तू किस महत्त्वसे युक्त रहनेवाले इस राजाके प्रति इस तरह सम्मानित वचन कह रहा है ? क्या तू इसे गाड़ीवाले रैक्वके समान बतलाता है ?' [ इसपर उसने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' 'जिस प्रकार [ द्यूतक्रीडामें ] कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उससे निम्न श्रेणीके सारे पासे हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रजा जो कुछ सत्कर्म करती है वह सब उस ( रैक्व ) को प्राप्त हो जाता है। जो बात वह रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जानता है, उसके विषयमें भी मुझसे यह कह दिया गया' ॥ २–४॥
इस बातको जानश्रुति पौत्रायणने सुन लिया। [ दूसरे दिन प्रातःकाल ] उठते ही उसने सेवकसे कहा—'अरे भैया ! तू गाड़ीवाले रैक्वके समान मेरी स्तुति क्या करता है ?' [ इसपर सेवकने पूछा— ] 'यह जो गाड़ीवाला रैक्व है, कैसा है ?' [ राजाने कहा— ] 'जिस प्रकार कृतनामक पासेके द्वारा जीतनेवाले पुरुषके अधीन उसके निम्नवर्ती समस्त पासे हो जाते हैं, उसी प्रकार उस रैक्वको, जो कुछ भी प्रजा सत्कर्म करती है, वह सब प्राप्त हो जाता है। तथा जो कुछ ( वह रैक्व ) जानता है, उसे जो कोई जानता है, वह भी इस कथनद्वारा मैंने बतला दिया' ॥ ५-६ ॥
वह सेवक उसकी खोज करनेके अनन्तर 'मैं उसे नहीं पा सका' ऐसा कहता हुआ लौट आया । तब उससे राजाने कहा—'अरे ! जहाँ ब्राह्मणकी खोज की जाती है वहाँ उसके पास जा ।' उसने एक छकड़ेके नीचे खाज खुजलाते हुए [ रैक्वको देखा ]। वह रैक्वके पास बैठ गया और बोला—'भगवन् ! क्या आप ही गाड़ीवाले रैक्व हैं ?' रैक्वने 'अरे ! हाँ, मैं ही हूँ' ऐसा कहकर स्वीकार किया। तब वह सेवक यह समझकर कि 'मैने उसे पहचान लिया है' लौट आया ॥७-८॥
द्वितीय खण्ड
जानश्रुतिको रैक्वके पास उपदेशके लिये जाना
तब वह जानश्रुति पौत्रायण छः सौ गौएँ, एक हार और एक खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ लेकर उसके पास आया और बोला—'रैक्व ! ये छः सौ गौएँ, यह हार और यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ मैं आपके लिये लाया हूँ। आप इस धनको स्वीकार कीजिये और भगवन् ! आप मुझे उस देवताका उपदेश दीजिये, जिसकी आप उपासना करते हैं।' उस रैक्वने कहा—'अरे शूद्र ! गौओंके सहित यह हारयुक्त रथ तेरे ही पास रहे।' तब वह जानश्रुति पौत्रायण एक सहस्र गौएँ, एक हार, खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ और अपनी कन्या—इतना धन लेकर फिर उसके पास आया और उससे बोला—'रैक्व ! ये एक सहस्र गौएँ, यह हार, यह खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ, यह पत्नी और यह ग्राम, जिसमें कि आप रहते हैं, स्वीकार कीजिये और भगवन् ! मुझे अवश्य उपदेश कीजिये।' तब उस ( राजकन्या ) के मुखको ही [ विद्याग्रहणका द्वार ] समझते हुए रैक्वने कहा—'अरे शूद्र ! तू ये ( गौएँ आदि ) लाया है [ सो ठीक है, ] तू इस विद्याग्रहणके द्वारसे ही मुझसे भाषण कराता है।' इस प्रकार जहाँ वह रैक्व रहता था, वहाँ रैक्वपर्णनामक ग्राम महावृष देशमें प्रसिद्ध है। तब उसने उससे कहा ॥ १–५ ॥
तृतीय खण्ड
वायु और प्राणकी उपासना
वायु ही संवर्ग है। जब अग्नि बुझता है तो वायुमें ही लीन होता है, जब सूर्य अस्त होता है तो वायुमें ही लीन होता है, और जब चन्द्रमा अस्त होता है तो वायुमे ही लीन हो जाता है। जिस समय जल सूखता है वह वायुमें ही लीन,