कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४३२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ४ सप्तदश खण्ड यज्ञमें योग्य ब्रह्माकी आवश्यकता प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया । उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले । पृथ्वीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको निकाला । फिर उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये । तदनन्तर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक्- श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन रसोंको ग्रहण किया। उस यज्ञमें यदि ऋक्-श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतकी पूर्ति करता है। और यदि यजुःश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्निमे हवन करे । इस प्रकार वह यजुओंके रससे यजुओंके वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है। और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर आहवनीयाग्निमे हवन करे। इस प्रकार वह सामके रससे सामके वीर्यद्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतिकी पूर्ति करता है। इस विषयमे ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लवण (क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको, त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको और लोहेसे काष्ठको अथवा चमड़ेमे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसन्धान किया जाता है। जिसमे इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोद्वारा संस्कृत होता है। जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता है। इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाया प्रसिद्ध है कि 'जहाँ जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच जाता है' ॥ १-९॥ एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें घोड़ी योद्धाओकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनाये, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवाले- को नहीं ॥ १० ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥