कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 464, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४३४ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ५
अमावस्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये। इसी प्रकार 'वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले, 'सपदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले तथा 'आयत्नाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले। तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमे ले वह 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ—] 'हे मन्थ ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [अपने प्राणभूत] तेरे साथ अवस्थित है। वह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ राजा (दीप्तिमान्) और सबका अधिपति है। वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा। मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ।' फिर वह इस ऋचासेऽ पादशः [उस मन्थका] भक्षण करता है। 'तत्स॑वितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'व॒यं दे॒वस्य॑ भोजनम्' ऐसा कहकर भक्षण करता है, 'श्रेष्ठ सर्वधातमम्' ऐसा कहकर भोजन करता है तथा 'तुरं॒ भग॑स्य धीमहि' ऐसा कहकर कस (कटोरे) या चमस (चम्मच) को धोकर सारा मन्थलेप पी जाता है। तत्पश्चात् वह अग्निके पीछे चर्म अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञभूमि) पर वाणीका संयम कर [अनिष्ट स्वप्नदर्शनसे] अभिभूत न होता हुआ शयन करता है। उस समय यदि वह [स्वप्नमें] स्त्रीको देखे तो ऐसा समझे कि कर्म सफल हो गया। इस विषयमे यह श्लोक है— जिस समय काम्यकर्ममें स्वप्नमे स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ४-८ ॥
तृतीय खण्ड
श्वेतकेतु और प्रवाहणका संवाद; श्वेतकेतुके पिताका राजासे उपदेश माँगना
आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालदेशीय लोगोंकी सभामे आया। उससे जीवकके पुत्र प्रवाहणने कहा—'कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है?' इसपर उसने कहा—'हाँ, भगवन् !' ॥ १ ॥
'क्या तुझे मालूम है कि इस लोकसे जानेपर प्रजा कहाँ जाती है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् !' [प्रवाहण—] 'देवयान और पितृयान—इन दोनों मार्गोंका पारस्परिक वियोगस्थान तुझे मालूम है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं भगवन् !' [प्रवाहण—] 'तुझे मालूम है, वह पितृलोक भरता क्यों नहीं है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप (सोमामृतादि रस) 'पुरुष' सज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् ! नहीं।' 'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों कहता था? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है। उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' पिताने कहा—'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हे क्यों न बतलाता?' ॥ २-५ ॥
तब वह गौतम गोत्रोत्पन्न ऋषि राजा (जैवलि) के स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [दूसरे दिन] प्रातःकाल होते ही राजाके सभामे पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। राजाने उससे कहा—'भगवन् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये। उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें, आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात प्रश्नरूपसे कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह सङ्कटमे पड़ गया। उसे 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—'गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला— ॥ ६-७ ॥
* इस ऋचाका अर्थ इस प्रकार है—'हम प्रकाशमान सविताके उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही उस देवताके स्वरूपका ध्यान करते हैं।'