भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 832 में से

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पृष्ठ 466

४३६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५ शुक्लपक्षाभिमानी देवताओंको, शुक्लपक्षाभिमानियोंसे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर जाता है, उन छः महीनोंको, उन महीनोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमा- को और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव पुरुष है, वह उन्हें ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह देवयान मार्ग है ॥ १-२ ॥ तथा जो ये गृहस्थलोग ग्राममे इष्ट, पूर्त्त और दत्त—ऐसी उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं, धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छ. महीनोंमें सूर्य दक्षिण मार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते है। ये लोग संवत्सरको प्राप्त नहीं होते। दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। यह चन्द्रमा राजा सोम है। वह देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं। वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे फिर इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं। [वे पहले] आकाशको प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर अभ्र होते हैं। वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है। तब वे जीव इस लोकमे धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्टप्रद है। उस अन्नको जो-जो भक्षण करता है और जो-जो वीर्यसेचन करता है तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ॥ ३-६ ॥ उन (अनुशयी जीवों) मे जो अच्छे आचरणवाले होते हे वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरणवाले होते हे वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥ इनमेसे वे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने जानेवाले प्राणी होते हैं। 'उत्पन्न होओ और मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह परलोक नही भरता। अतः [इस संसारगतिसे] घृणा करनी चाहिये। इस विषयमे यह मन्त्र है—सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी। किंतु जो इस प्रकार इन पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उनके साथ आचरण (संसर्ग) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता। वह शुद्ध पवित्र और पुण्यलोकका भागी होता है, जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है ॥ ८-१० ॥ एकादश खण्ड प्राचीनशाल आदिका राजा अश्वपतिसे वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमें प्रश्न उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लविका पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्वका पुत्र बुडिल—ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १ ॥ उन पूजनीयोंने स्थिर किया कि यह अरुणका पुत्र उद्दालक इस समय इस वैश्वानर आत्माको जानता है; अतः हम उसके पास चलें। ऐसा निश्चय कर वे उसके पास गये। उसने निश्चय किया कि 'ये परम श्रोत्रिय महागृहस्थ मुझसे प्रश्न करेंगे, किंतु मै इन्हें पूरी तरहसे नहीं बतला सकूँगा, अतः मैं इन्हें दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' उसने इनसे कहा—'हे पूजनीयगण ! इस समय केकयकुमार अश्वपति इस वैश्वानरसंजक आत्माको अच्छी तरह जानता है। आइये, हम उसीके पास चलें।' ऐसा कहकर वे उसके पास चले गये ॥ २-४ ॥ अपने पास आये हुए उन ऋषियोंका राजाने अलग- अलग सत्कार कराया। [ दूसरे दिन ] प्रातःकाल उठते ही उसने कहा—'मेरे राज्यमे न तो कोई चोर ही है तथा न अदात्ता, मद्यप, अनाहिताग्नि, अविद्वान् और परस्त्रीगामी ही है, फिर कुलटा स्त्री तो आयी ही कहाँसे ? हे पूज्यगण ! मै भी यज्ञ करनेवाला हूँ। मे एक-एक ऋत्विक्को जितना धन दूँगा, उतना ही आपको भी दूँगा, अतः आपलोग यही ठहरिये।' वे बोले—'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुष कहीं जाता है उसे चाहिये कि वह अपने उसी प्रयोजनको कहे। इस समय आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिये।' वह उनसे बोला—'अच्छा, मैं प्रातःकाल आपलोगोंको इसका उत्तर दूंगा।' तब दूसरे दिन पूर्वाह्नमें वे हाथमें समिधाएँ लेकर राजाके पास गये। उनका उपनयन न करके ही राजाने उन्हें उस विद्याका उपदेश किया ॥ ५-७ ॥