कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 5, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरिः कल्याण-प्रेमियों तथा ग्राहकोंसे निवेदन १-इस 'उपनिषद्-अङ्क'में चित्रोंसमेत सब मिलाकर करीब ८३० पृष्ठ दिये गये हैं। इनके अतिरिक्त ३ बड़े साइजके यन्त्र हैं। रंगीन चित्र जितने सम्भव थे, दिये गये हैं। २-जिन सज्जनोंके रुपये मनीआर्डरद्वारा आ गये होंगे, उनके अङ्क जानेके बाद शेष ग्राहकोंके नाम वी० पी० भेजी जा सकेगी। अतः जिनको ग्राहक न रहना हो, वे कृपा करके मनाहीका एक कार्ड तुरंत डाल दें ताकि वी० पी० भेजकर 'कल्याण' को व्यर्थका नुकसान न उठाना पड़े। उनके दो पैसेके खर्चसे 'कल्याण' के कई आने बच जायँगे। आशा है, पुराने सम्बन्धके नाते वे इतना त्याग अवश्य स्वीकार करेंगे। ३-इस विशेषाङ्कका अलग मूल्य भी ६=) ही है। अतः पूरे वर्षके लिये ही ग्राहक बनना चाहिये। आजकल नये-नये उपद्रव तथा अशान्तिके कारण बन रहे हैं। इसलिये यदि किसी कारणवश आगेके अङ्क पूरे वर्षतक न भेजे जा सकें तो जितने अङ्क पहुँचें, उतनेमें ही मूल्य पूरा समझनेकी कृपा करें। ४-मनीआर्डर-कूपनमें अपना पता और ग्राहक-नंबर जरूर लिखें। ग्राहक-नंबर याद न हो तो कम-से- कम 'पुराना ग्राहक' अवश्य लिख दें। नये ग्राहक हों तो 'नया ग्राहक' लिखनेकी कृपा करें। ५-ग्राहक-नंबर न लिखनेसे आपका नाम 'नये ग्राहकों'में दर्ज हो जायगा। इससे आपकी सेवामें 'उपनिषद्-अङ्क' नये नंबरोंसे पहुँच जायगा और पुराने नंबरकी वी० पी० दुबारा जायगी। ऐसा भी हो सकता है कि उधरसे आपने रुपये भेजे हों और उनके हमारे पास पहुँचनेके पहले ही आपके नाम वी० पी० चली जाय। दोनों ही सूरतोंमें आपसे यह प्रार्थना है कि आप कृपापूर्वक वी० पी० लौटावें नहीं, चेष्टा करके कृपया नया ग्राहक बनाकर उनके नाम-पते साफ-साफ हमें लिखनेकी कृपा करें। आप ऐसा करेंगे तो आपका 'कल्याण' नुकसानसे बचेगा और आप 'कल्याण' के प्रचारमें सहायता करके पुण्यके भागी बनेंगे। अगर नया ग्राहक न मिले तो वी० पी० नहीं छुड़ानी चाहिये। ६-'उपनिषद्-अङ्क' सब ग्राहकोंके पास रजिस्टर्ड पोस्टसे जायगा। सब अङ्कोंके जानेमें लगभग दो महीने लग जाते हैं; क्योंकि पोस्ट-आफिसवाले प्रतिदिन अधिक संख्यामें रजिस्टर्ड पैकेट नहीं ले पाते। इसलिये ग्राहक महोदयोंकी सेवामें विशेषाङ्क क्रमसे जायगा। परिस्थिति समझकर कृपालु ग्राहकोंको हमें क्षमा करना चाहिये और धैर्य रखना चाहिये। ७-जिन कल्याण-प्रेमी महानुभावोंने 'कल्याण'के नये ग्राहक बनाये हैं और बना रहे हैं, उनके हम हृदयसे कृतज्ञ हैं। इस बार कल्याण-प्रेमी सज्जनोंको 'कल्याण'के नये ग्राहक बनानेकी फिर सफल चेष्टा करनी चाहिये। धर्मपर इस समय बड़ी विपत्ति आयी हुई है। ऐसे समयमें शुद्ध धर्म-सेवा समझकर 'कल्याण'का प्रचार बढ़ानेमें सभीको सहायक होना चाहिये। ८-गीताप्रेस पोस्ट-आफिस अब 'डिलेवरी आफिस' हो गया है। अतः 'कल्याण' व्यवस्था-विभाग तथा सम्पादन-विभाग और 'गीताप्रेस' तथा 'गीता-रामायण-परीक्षा-समिति'के नाम भेजे जानेवाले सभी पत्र, पारसल, पैकेट, रजिस्ट्री, बीमा आदिपर केवल गोरखपुर न लिखकर पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) इस प्रकार लिखना चाहिये। व्यवस्थापक—'कल्याण', पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) क्ष--