कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 502, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४६८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय १ षष्ठ नाम-रूप और कर्म यह नाम, रूप और कर्म—तीनका समुदाय है। उन नामोंकी 'वाक्' यह उक्थ (कारण) है, क्योंकि सारे नाम इसीसे उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है। यही सब नामोंमें समान है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त नामोंको धारण करती है। अब, रूपोंका चक्षु समन्वय है, यह इसका उक्थ है। इसीसे सारे रूप उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त रूपोंके प्रति सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त रूपोंको धारण करता है। अब, कर्मोंका समन्वय आत्मा (शरीर) है। यह इनका उक्थ है। इसीसे सब कर्म उत्पन्न होते हैं। यह इनका साम है, क्योंकि यह समस्त कर्मोंके प्रति सम है। यह इनका ब्रह्म है, क्योंकि यही समस्त कर्मोंको धारण करता है। ये तीन होते हुए भी एक आत्मा हैं और आत्मा भी एक होते हुए इन तीन रूपोंमें है। वह यह अमृत सत्यसे आच्छादित है। प्राण ही अमृत है और नाम रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है ॥ १-३ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥