भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 832 में से

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पृष्ठ 574

५३४ * श्रीरामपूर्वत्तापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ६ पञ्चम खण्ड खरके वधसे लेकर वाली-वधतकका संक्षिप्त चरित्र 'रघुवीर ! आप हमे ऐश्वर्यकी प्राप्ति कराइये।' भगवान् | आश्रमपर गये । वहाँ शबरीने उनका बड़ी भक्तिसे स्वागत- श्रीरामने जबतक खर नामक राक्षसका वध किया, उतने | सत्कार किया । तत्पश्चात् आगे जानेपर उन्हें वायुपुत्र समयतक देवता आदि उपर्युक्त रूपसे उनकी स्तुति करके | भक्तवर हनुमान्‌जी मिले, जिन्होंने (मध्यस्थरूपमें) उनके साथ सुखपूर्वक स्थित हुए । देवताओंकी ही भाँति | कपिराज सुग्रीवको बुलाकर उनके साथ दोनो भाइयोंकी मैत्री ऋषि भी भगवान्‌की स्तुति करते रहे। उस समय खर | करायी। तत्पश्चात् दोनों भाइयोंने सुग्रीवसे अपना सब हाल आदिके मारे जानेपर राक्षसकुलोत्पन्न रावण (मारीचके | आदिसे अन्ततक कह सुनाया ॥ १-५ ॥ साथ) वनमें आया और उसने अपने ही विनाशके लिये | सुग्रीवको श्रीरामके पराक्रममे संदेह था, अतः उन्होंने रामपत्नी सीताजीको हर लिया। उन दिनों सीता भी वनमें ही | श्रीरामको दुन्दुभिनामक राक्षसका विशाल शरीर दिखाया रहती थीं। उसने 'वन' से उनको हरण किया, इससे वह राक्षस | (जिसे वालीने मार गिराया था); श्रीरामने दुन्दुभिके उस रावण कहलाया ('राम' शब्दसे 'रा' एवं 'वन' शब्दसे 'वन' लेकर | शवको अनायास ही बहुत दूर फेंक दिया। इसके सिवा एक 'रावण' नाम बना)। अथवा दूसरोंको रुलानेके कारण वह रावण | ही बाणसे सात तालवृक्षोंको तत्काल बींध डाला और इस कहलाता था । (अथवा एक दिन दशाननने कैलासको उठा | प्रकार अपने मित्रको आश्वासन देकर प्रसन्नताका अनुभव लिया था, तब महादेवजीने कैलासपर बहुत भार डाल दिया। | किया। इससे कपिराज सुग्रीवको बड़ा हर्ष हुआ । इसके उस समय) दशाननने बड़ा रव किया, इसीसे उसका नाम रावण | बाद वे श्रीरघुनाथजी सुग्रीवके नगरमें गये । वहाँ वाली- हो गया । तदनन्तर श्रीराम और लक्ष्मण सीतादेवीका पता | के भाई सुग्रीवने बड़ी विकट गर्जना की। उस गर्जनाको लगानेके ब्याजसे वनभूमिपर विचरने लगे । सामने कबन्ध | सुनकर वाली बड़े वेगसे घरके बाहर निकला । श्रीरामने युद्ध- नामक असुरको उपस्थित देख दोनों भाइयोंने उसे मार | मे उस वालीको मार गिराया और किष्किन्धाके राज्यसिंहासन- डाला और उस कबन्धके कथनानुसार वे दोनों शबरीके | पर सुग्रीवको बिठा दिया ॥ ६-९ ॥ षष्ठ खण्ड शेष चरित्रका संक्षिप्त वर्णन, आवरण-पूजाके लिये यन्त्रस्थ देवताओंका निरूपण तदनन्तर सुग्रीवने वानरोंको बुलाकर कहा--'वानर-वीरो ! | वहाँका राजा बनाया और जनकनन्दिनी सीताको साथ ले तुम सब दिशाओंकी बातें जानते हो। इस समय शीघ्र यहाँसे | उन्हें अपने वाम अङ्कमे बिठाकर उन सब वानरोंके साथ अपनी जाओ और मिथिलेशकुमारी सीताको आज ही ढूँढ लाकर | पुरी अयोध्याको प्रस्थान किया ॥ १-६ ॥ रघुनाथजीको अर्पित करो ।' ( इस आदेशके अनुसार सब | अब द्विभुजरूपधारी श्रीरघुनाथजी अयोध्याके राजसिंहासन- दिशाओंकी ओर बहुत से वानर चल पड़े ।) तत्पश्चात् | पर विराजमान है। वे धनुष धारण किये हुए हैं। उनका हनुमान्जी (जो कुछ प्रमुख वानरोंके साथ दक्षिण दिशामे | चित्त स्वभावतः प्रसन्न है । वे सब प्रकारके आभूषणोंसे खोज करनेके लिये भेजे गये थे ) समुद्र लाँघकर लङ्कामें | विभूषित हैं। दाहिने हाथमे ज्ञानमयी और बायें हाथमें तेज-१ गये । वहाँ सीताजीका दर्शन करके उन्होंने अनेक असुरोंका वध किया और लङ्कामे आग लगा दी । फिर वहाँसे श्रीरामके पास लौटकर सब समाचार यथावत् कह सुनाया। तब भगवान् श्रीरामने क्रोधका अभिनय किया— रावणके प्रति क्रोधयुक्त होकर उन वानरोको बुलाया और उनके साथ अस्त्र शस्त्र लेकर लङ्कापुरीपर आक्रमण किया । लङ्काका भलीभाँति निरीक्षण करके भगवान्ने वहाँके राजा रावणके साथ युद्ध छेड़ दिया। उस युद्धमें भाई कुम्भकर्ण तथा पुत्र इन्द्रजित्‌के सहित रावणको मारकर उन्होने विभीषणको १ ज्ञान-मुद्राका लक्षण इस प्रकार है- तर्जन्यङ्गुष्ठौ संक्तावग्रतो हृदि विन्यसेत् । वाम हस्ताम्बुज वामे जानु मूर्धनि विन्यसेत् । ज्ञानमुद्रा भवेदेषा रामचन्द्रस्य वल्लभा ॥ दाहिने हाथकी तर्जनी और अँगूठेको सटाकर आगेकी ओर छातीपर रक्खे और बायें हाथको बायें घुटनेके ऊपर रक्खे । यह ज्ञानमुद्रा है, जो श्रीरामचन्द्रजीको बहुत प्रिय है।