कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 576, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५३६ * श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद् *
सप्तम खण्ड पूजा-यन्त्रका विस्तृत वर्णन
[स्तम्भ १] इस प्रकार संक्षेपसे पूजा-यन्त्रका वर्णन किया गया । अब उसका पूर्णतः निर्देश किया जाता है । समरेखाओंके दो त्रिकोण बनाकर उनके मध्यभागमें दो प्रणवोंका पृथक् पृथक् उल्लेख करे । फिर उन दोनोंके बीचमें आद्यबीज (रा) लिखकर उसके नीचे साध्य-कार्यका उल्लेख करे । साध्यका नाम द्वितीयान्त होना चाहिये । आद्यबीजके ऊपरी भागमें साधकका नाम लिखना चाहिये । साधकका नाम षष्ठ्यन्त रहना चाहिये । तत्पश्चात् बीजके दोनो ओर—वाम दक्षिण पार्श्वोंमे एक एक 'कुरु' पदका उल्लेख करना चाहिये । बीजके बीचमें और साध्यके ऊपर श्री-बीज 'श्रीं' लिखे । बुद्धिमान् पुरुष यह सब बीज आदि इस प्रकार लिखे कि वे दोनों प्रणवोंसे सम्पुटित रहें । फिर छहों कोणोंमे दीर्घस्वरसे युक्त मूल-बीजका उल्लेख करे, साथ ही क्रमशः एक एकके साथ 'हृदयाय नमः', 'शिरसे स्वाहा' इत्यादिको भी अङ्कित करे । (अर्थात् 'रा हृदयाय नमः', 'रीं शिरसे स्वाहा', 'रू शिखायै वषट्', 'रैं कवचाय हुम्', 'रौं नेत्राभ्या वौषट्' तथा 'रः अस्त्राय फट्'—इस प्रकार छः वाक्य छः कोणोंमें लिखने चाहिये ।) कोणोंके पार्श्व-भागमें रमाबीज (श्रीं ) और माया-बीज ( ह्रीं ) लिखे तथा उसके आगे काम-बीज ( क्लीं ) का उल्लेख करे ।
[स्तम्भ २] कोणके अग्रभाग और भीतरी भागोंमे क्रोध- लिखकर मन्त्र साधक उस 'हुम्' के दोनों पाश्र्व बीज ( ऐं ) लिखे । फिर तीन वृत्त ( गोलाव बनाये ( इनमे एक वृत्त तो षटकोणके ३ एक मध्यमें होगा और एक दलोंके अग्रभागमें इन तीन वृत्तोंके साथ-साथ एक अष्टदल = लिखे । कमलके जो केसर हैं, उनमें दो दो अक्ष सभी स्वर-वर्णोंका उल्लेख करे । आठों दलोंमें स्वरं व्यञ्जन वर्णोंके आठ वर्गोंका, लेखन करे (आठ वर्ग ये हैं- चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, यवर्ग, शवर्ग और लवर्ग)। ८ दलोंमे अष्टवर्गके ऊपर आगे बताये जानेवाले माला-मन्त्र वर्णोंका एक एक दलमे छः छः वर्णके क्रमसे उल्लेख अन्तिम दलमें अवशिष्ट पाँच वर्णोंका ही उल्लेख होगा। प्रकारसे पुनः एक अष्टदल कमल बनाये । उसके आठ 'ॐ नमो नारायणाय' इस अष्टाक्षर-मन्त्रके एक-एक अ न्यास करे । उसके केसरमें रमा-बीज (श्रीं) लिखे । उसके बारह दलोका कमल बनाये । और उसके बारहों द द्वादशाक्षर मन्त्र 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इसके एक अक्षरको अङ्कित करे ॥ १-८ ॥
अष्टम खण्ड पूजा-यन्त्रके अगले अङ्गोंका वर्णन
[स्तम्भ १] उक्त द्वादशदल कमलके केसरोमें 'अकार'से लेकर 'क्ष' तकके वर्णोंको ( १६ स्वर और ३५ व्यञ्जन) गोलाकार लिखे । ( एक एक केसरमें चार-चार अक्षर होंगे, किंतु अन्तिम केसरमें सात होंगे ।) उसके बाह्यभागमे पुनः षोडशदल कमल लिखे और उसके केसरोंमें माया-बीज (ह्रीं) का उल्लेख करे । उसके षोडश दलोंमें एक-एक अक्षरके क्रमसे 'हु' 'फट्' 'नमः' तथा द्वादशाक्षर मन्त्रंको अङ्कित करे । षोडश दलोंकी संधियोंमें मन्त्रवेत्ता पुरुष हनुमान्जी आदिके बीज-मन्त्र लिखे । वे मन्त्र
[स्तम्भ २] इस प्रकार है—ह्र स् भृ व्लृ भ् जू और भृ । (इन् अतिरिक्त धृष्टि आदिके बीज मन्त्रोंका भी उल्लेख करे ये हैं— घृं जू' वृ स्तू भृं अं घृ और सं । मूल श्लोक आये हुए 'च' से इनका समुच्चय होता है।) उसके बाह्यभाग बत्तीस दलोंका महाकमल बनाये, जो नाद और बिन्दुसे युक्त हो उसके दलोंपर यत्नपूर्वक नारसिंह मन्त्रराजके बत्तीस अक्षरोंको लिखे । उन दलोंमें ही आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और सबको धारण करनेवाले$^३$ वषट्कारका न्यास एव ध्यान
पाद-टिप्पणी: १ द्वादशाक्षर मन्त्र यह है—'ॐ ह्रीं भरताग्रज राम ह्रीं स्वाहा' । २ नारसिंह-मन्त्रराज इस प्रकार है—
उग्रं वीरं महाविष्णु ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् । नृसिंह भीषणं भद्र मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् ॥
३ वषट्कारके साथ मूल श्लोकमें 'धाता' शब्दका प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ 'धारण करनेवाला' है । वषट्कार दानके अर्थमे प्रयुक्त होता है । दानसे ही समस्त लोक धारण किये जाते हैं, अत 'धाता' पद 'वषट्कार' का विशेषण ही है । 'धाता' को देवतावाचक इसलिये नहीं मानना चाहिये कि बारह आदित्योंकी श्रेणीमें धाता नामक आदित्यका नाम आ चुका है । अथवा 'धाता' पद ब्रह्माजीका वाचक है और 'वषट्कार' उसका विशेषण है । ब्रह्माजी ही सबको जन्म और जीवन प्रदान करते हैं, अत उनके लिये 'वषट्कार' विशेषण देना उपयुक्त ही है ।