कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 584, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद्
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम खण्ड
काशी एवं तारक-मन्त्रकी महिमा, ॐकाररूप पुरुषोत्तम रामके चार पाद
[बायाँ स्तम्भ] ॐ बृहस्पतिने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'ब्रह्मन् ! जिस तीर्थके सामने कुरुक्षेत्र भी छोटा लगे, जो देवताओंके लिये भी देव पूजनका स्थान हो, जो समस्त प्राणियोंके लिये परमात्म-प्राप्तिका निकेतन हो, वह कौन है ?' यह प्रश्न सुनकर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया—'निश्चय ही अविमुक्त तीर्थ ही प्रधान कुरुक्षेत्र (सत्कर्मका स्थान) है। वही देवताओंके लिये भी देव पूजाका स्थान है; वही समस्त प्राणियोंके लिये परमात्म-प्राप्तिका निकेतन है। अतः जहाँ कहीं भी जाय, उस अविमुक्त तीर्थको ही प्रधान कुरुक्षेत्र माने। वही देवताओंके लिये भी देवाराधनका स्थान है। वही सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये परब्रह्म-प्राप्तिका स्थान है। यहाँ जीवके प्राण निकलते समय भगवान् रुद्र तारक ब्रह्मका उपदेश करते हैं, जिससे वह अमृतमय होकर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। इसलिये अविमुक्त (काशी) का ही सेवन करे। अविमुक्त तीर्थका कभी परित्याग न करे। ठीक ऐसी ही बात है।' इस प्रकार याज्ञवल्क्यने समझाया। १।
तदनन्तर भरद्वाजने याज्ञवल्क्यजीसे पूछा—'भगवन् ! कौन तारक (तारनेवाला) है और कौन तरता है ?' इस प्रश्नके उत्तरमें वे प्रसिद्ध याज्ञवल्क्य मुनि बोले—'तारक-मन्त्र इस प्रकार होता है। दीर्घ आकारसहित अनल (रेफ, रकार) हो और वह रेफ बिन्दु (अनुस्वार) से पहले स्थित हो, उसके बाद पुनः दीर्घ स्वरविशिष्ट रेफ हो और उसके अनन्तर 'माय नमः' ये दो पद हों, इस प्रकार 'रा रामाय नमः' यह तारक मन्त्रका स्वरूप है। इसके सिवा 'राम' पदके सहित 'चन्द्राय नम' और 'भद्राय नम' ये दो मन्त्र भी तारक ही
[दायाँ स्तम्भ] हैं। ये तीन मन्त्र क्रमशः ॐकारस्वरूप, तत्स्वरूप और ब्रह्मस्वरूप हैं। ये ही क्रमशः 'सत्', 'चित्' और 'आनन्द' नाम धारण करते हैं। इस प्रकार इनकी उपासना करनी चाहिये। ॐकारमें प्रथम अक्षर अकार है, दूसरा अक्षर उकार है, तीसरा अक्षर मकार है, चौथा अक्षर अर्धमात्रा है, पञ्चम अक्षर अनुस्वार है और छठा अक्षर नाद है। (इस प्रकार छः अक्षरवाला तारक-मन्त्र होता है।) यह सबको तारनेवाला होनेसे तारक कहलाता है। उस ॐकार अथवा 'रा' इस बीज-मन्त्रमय अक्षरको ही तुम 'तारक ब्रह्म' समझो। वही उपासनाके योग्य है—यो जानना चाहिये। वह गर्भ, जन्म, जरावस्था, मृत्यु तथा सांसारिक महान् भयसे भलीभाँति तार देता है। इसलिये 'तारक' इस नामसे उसका कथन किया जाता है। जो ब्राह्मण इस तारक-मन्त्रका सदा जप करता है। वह सम्पूर्ण पापोको पार कर जाता है, वह मृत्युको लाँघ जाता है, वह ब्रह्महत्यासे तर जाता है, वह भ्रूणहत्यासे तर जाता है तथा वह वीर-हत्यासे तर जाता है। इतना ही नहीं, वह सम्पूर्ण हत्याओंसे तर जाता है, वह संसारसे तर जाता है, सबको पार कर जाता है। वह जहाँ कहीं भी रहता हुआ अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम) में ही रहता है। वह महान् होता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ॥ २ ॥
इस विषयमें ये श्लोक हैं— अकाराक्षरसम्भूतः सौमित्रिर्विश्वभावनः । उकाराक्षरसम्भूतः शत्रुघ्नस्तैजसात्मकः ॥