भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592

५५० ⁓ श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् ⁓ [ खण्ड १ भाग जो 'नम' पद है, उसे भी पूर्णानन्दैकविग्रह परमात्म- ज्ञात होता है। वह मानो सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा भगवान्‌का स्वरूप ही जानना चाहिये। सम्पूर्ण देवता और मुमुक्षु पुरुष यजन कर लेता है। उसके द्वारा इतिहास-पुराणोंका तथा सदा अपने हृदयमें उसको नमन करते रहते हैं। रुद्र-मन्त्रोंका लक्ष बार जप सम्पन्न हो जाता और उसका फल भी जो श्रीरामचन्द्रके इस षडक्षर मन्त्रराज ('रां रामाय नमः') उसे मिलता है। प्रणवका तो मानो वह सौ अरब जप कर लेता का प्रतिदिन नियमपूर्वक जप करता है, वह अग्निमें तपाकर है। वह अपने पूर्वकी तथा भावी दस दस पीढ़ियोंको पवित्र शुद्ध किया हुआ हो जाता है। वह वायु, सूर्य, चन्द्रमा, कर देता है। वह (समस्त पापोंसे छूटकर) पङ्क्तिपावन बन ब्रह्मा, विष्णु तथा रुद्र देवताके द्वारा भी पवित्र कर दिया जाता है। वह महान् हो जाता है और वह अमृतत्वको प्राप्त जाता है। वह सम्पूर्ण देवताओंके द्वारा 'ब्रह्मवेत्ता' रूपसे होता है।

॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

रोग और मृत्युको तप समझनेसे महान् लाभ एतद् वै परमं तपो यद् व्याहितस्तप्यते परमं हैव लोकं जयति, य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमरण्यं हरन्ति परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद, एतद् वै परमं तपो यं प्रेतमग्नावभ्यादधति परमं हैव लोकं जयति य एवं वेद। (बृहदारण्यक० ५ । ११ । १) ज्वरादि व्याधियोंसे जो कष्ट होता है, उसको निश्चय ही परम तप समझे। जो ऐसा जानता है, वह परम लोक- को ही जीत लेता है। (तपकी भावनाके कारण शारीरिक कष्ट होते हुए भी दुःख नहीं होता और तपका फल प्राप्त होता है।) मृत मनुष्यको जो वनमें जलानेके लिये ले जाते हैं, उसको निश्चय ही परम तप समझे, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको जीत लेता है। मृतक मनुष्यको जो अग्निमें जलाते हैं वह भी निश्चय ही परम तप है, जो ऐसा जानता है, वह परम लोकको ही जीत लेता है। (मृत्युमें तपकी भावनासे मरण-कष्ट नहीं होता और अन्तमें मनमें तपरूप परमात्मा- की स्मृति रहनेसे दिव्य धाम या परमात्माकी प्राप्ति होती है।)