कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 594, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५५२ * गोपालपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २
तब उन मुनियोंने पुन. प्रश्न किया—'भगवन् ! श्रीकृष्ण- का ध्यान करनेयोग्य रूप कैसा है ? उनके नामामृतका रसास्वादन कैसे होता है ? तथा उनका भजन किस प्रकार किया जाता है ? यह सब हम जानना चाहते हैं, अतः हमें बताइये' ॥ ७ ॥ तब वे हिरण्यगर्भ ब्रह्माजी स्पष्ट शब्दोंमें उत्तर देते हुए बोले, 'भगवान्का ध्यान करनेयोग्य रूप इस प्रकार है— ग्वाल-बालका सा उनका वेष है, नूतन जलधरके समान श्याम वर्ण है, किशोर अवस्था है तथा वे दिव्य कल्पवृक्षके नीचे विराज रहे हैं।' इसी विषयमे यहाँ ये श्लोक भी हैं—॥ ८ व ९ ॥ सत्पुण्डरीकनयनं मेघाभं वैद्युताम्बरम् । द्विभुजं ज्ञानमुद्राढ्यं वनमालिनमीश्वरम् ॥ गोपगोपीगवावीतं सुरद्रुमतलाश्रितम् । दिव्यालङ्करणोपेतं रत्नपङ्कजमध्यगम् ॥ कालिन्दीजलकल्लोलसङ्गिमारुतसेवितम् । चिन्तयन्चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृते ॥ भगवान्के नेत्र विकसित श्वेत कमलके समान परम सुन्दर हैं, उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति मेघके समान श्याम है, वे विद्युत्- के सदृश तेजोमय पीताम्बर धारण किये हुए हैं, उनकी दो भुजाएँ हैं, वे ज्ञानकी मुद्रामें स्थित हैं, उनके गलेमें पैरौतक लबी वनमाला शोभा पा रही है, वे ईश्वर हैं—ब्रह्मा आदि देवताओंपर भी शासन करनेवाले हैं, गोपों तथा गोप सुन्दरीयों- द्वारा वे चारों ओरसे घिरे हुए हैं, कल्पवृक्षके नीचे वे स्थित हैं, उनका श्रीविग्रह दिव्य आभूषणोंसे विभूषित है, रत्न सिंहासन- पर रत्नमय कमलके मध्यभागमें वे विराजमान हैं। कालिन्दी- सलिलसे उठती हुई चञ्चल लहरोंको चूमकर बहनेवाली शीतल-मन्द सुगन्ध वायु भगवान्की सेवा कर रही है। इस रूपमे भगवान् श्रीकृष्णका मनमे चिन्तन करनेवाला भक्त संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ १०-१२ ॥ अब पुन उनके नामामृतके ग्नास्वादन तथा मन्त्र-जपका प्रकार बतलाते हैं—॥ १३ ॥ जलवाचक 'क्', भूमिता बीज 'ल्', 'ई', तथा चन्द्रमा- के समान आकार धारण करनेवाला अनुस्वार—इन सबका समुदाय है—'क्लीं', यही काम बीज है। इसके आदिमे रखकर 'कृष्णाय' पदका उच्चारण करे। यह 'क्लीं कृष्णाय' सम्पूर्ण मन्त्रका एक पद है। 'गोविन्दाय' यह दूसरा पद है। 'गोपीजन' यह तीसरा पद है। 'वल्लभाय' यह चौथा पद है और 'स्वाहा' यह पाँचवाँ पद है। पाँच पदोका यह 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा' मन्त्र 'पञ्चपदी' कहलाता है। आकाश, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि— इन सबका प्रकाशक अथवा स्वरूप होनेके कारण यह चिन्मय मन्त्र पाँच अङ्गोंसे युक्त है। अतः— क्लीं कृष्णाय दिवात्मने हृदयाय नम । गोविन्दाय भूम्यात्मने शिरसे स्वाहा। गोपीजनसूर्यात्मने शिखायै वषट् । वल्लभाय चन्द्रात्मने कवचाय हुम्। स्वाहा अग्न्यात्मनेऽस्त्राय फट् । —इस प्रकार पञ्चाङ्गन्यास करके इस पाँच पद और पाँच अङ्गोवाले मन्त्रका जप करनेवाला साधक मन्त्रात्मक होनेसे परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होता है, परब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णको प्राप्त होता है॥ १४ ॥
द्वितीय उपनिषद् श्रीकृष्णोपासनाकी विधि तथा यन्त्र-निर्माणका प्रकार
इस विषयमें यह श्लोक (मन्त्र) है—"जो उपासक 'क्लीं' इस कामबीजको आदिमें रखकर 'कृष्णाय' इस पदका, 'गोविन्दाय' इस पदका तथा 'गोपीजनवल्लभाय' इस पदका 'स्वाहा' सहित एक ही साथ उच्चारण करेगा, उसे शीघ्र ही श्रीकृष्ण-मिलनरूपा सद्गति प्राप्त होगी। उसके लिये दूसरी गति नहीं है।” इन श्रीकृष्ण भगवान्की भक्ति ही भजन है। उस भजनका स्वरूप है—इस लोक तथा परलोकके समस्त भोगोंकी कामनाका सर्वथा परित्याग करके इन श्रीकृष्णमें ही इन्द्रियोंसहित मनको लगा देना। यही नैष्कर्म्य (वास्तविक सन्यास) भी है। उन सचिदानन्द- मय भगवान् श्रीकृष्णका वेदज्ञ ब्राह्मण नाना प्रकारसे यजन करते हैं, 'गोविन्द' नामसे प्रसिद्ध उन भगवान्की अनेक प्रकारसे आराधना करते हैं। वे 'गोपीजनवल्लभ' (जीवमात्रके अकारण सुहृद् एव प्रियतम तथा गोप सुन्दरियोके प्राणाधार) श्यामसुन्दर ही सम्पूर्ण लोकोका पालन करते हैं और सम्यग्- रूप उत्तम वीर्यवाले उन भगवान्ने ही 'स्वाहा' (अपनी माया- शक्ति) का आश्रय लेकर जगत्को उत्पन्न किया है। जैसे सम्पूर्ण विश्वमे फैला हुआ एक ही वायुतत्त्व प्रत्येक शरीरके भीतर प्राण आदि पाँच रूपोंसे अभिव्यक्त हुआ है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण एक होते हुए भी इस उपर्युक्त मन्त्रमें