कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 625, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपनिषद् ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७७ नृसिंहदेव हैं, जो कि मनु एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (द्र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि मृत्यु एवं भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (मृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि यम एवं भूः भुव.-स्व'— त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (त्युं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि अन्तक एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (मृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि प्राण एव भूः- भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (त्यु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सूर्य एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (न) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सोम एवं भूः-भुवः-स्व.-—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (ग) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विराट् पुरुष एव भूः-भुवः- स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (म्य) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि जीव एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हे, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (ह) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सर्वरूप एव भूः- भुव स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है॥ १-३२॥ ये (मन्त्रराजके ३२ अक्षरोंके अनुसार) बत्तीस मन्त्र हैं। इन मन्त्रोंको बताकर प्रजापतिने उन देवताओंसे कहा— 'देवगण ! तुमलोग इन मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान्का स्तवन करो। इससे भगवान् नृसिंहदेव प्रसन्न होते और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं। इसलिये जो इन मन्त्रोंद्वारा नित्य भगवान् नरसिंहदेवकी स्तुति करता है, वह उनका प्रत्यक्ष दर्शन पाता है तथा उनके विश्वरूपको देख लेता है। साथ ही वह अमृतत्वको भी प्राप्त होता है। जो इस प्रकार जानता है, उसे भी वही फल मिलता है। यह महोपनिषद् है॥ ४॥
पञ्चम उपनिषद् आनुष्टुभ मन्त्रराजके सुदर्शन नामक महाचक्रका वर्णन, मन्त्रराजके जपका फल
कहते हैं, देवताओंने श्रद्धापूर्वक प्रजापतिसे कहा— "भगवन् ! श्रीमन्नृसिंहदेवके आनुष्टुभ मन्त्रराजका जो 'महाचक्र' नामक चक्र है, उसका हमसे वर्णन कीजिये। यह चक्र सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा मोक्षका द्वार है—इस प्रकार योगीजन वर्णन करते हैं।" यह सुनकर वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले—निश्चय ही यह सुदर्शन नामक महाचक्र छः अक्षरोंका है, इसीलिये यह छः अरोंसे युक्त होता है—छः दलोंवाला चक्र बनता है। छः ही ऋतुएँ होती हैं, ऋतुओंसे ही इसके अरोंकी समानता की जाती है। अर्थात् इसके छः दलोंमें छः ऋतुओंकी भावना करनी चाहिये। इसके मध्यमें नाभि होती है। नाभिमे ही ये अरे प्रतिष्ठित होते हैं। फिर यह सारा चक्र मायारूप नेमिसे आवेष्टित होता है। माया आत्माका स्पर्श नहीं करती, इसलिये वह षड्दल चक्र बाहरकी ओरसे ही मायाद्वारा आवेष्टित होता है। इसके बाद आठ अरोंसे युक्त अष्टदल चक्र बनता है। आठ अक्षरोंकी ही एक पादवाली गायत्री होती है; गायत्रीके अक्षरोंसे ही इस चक्रके अरोंकी तुलना की जाती है। (इसके आठ दलोंमे गायत्रीके एक पादकी भावना करे।) यह भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। निश्चय ही यह माया प्रत्येक क्षेत्रको व्याप्त किये रहती है। इसके बाद द्वादश अरोंसे युक्त द्वादशदलका चक्र होता है। बारह अक्षरोंका ही जगती छन्द (का एक पाद) होता है। जगतीकी अक्षर संख्यासे ही यह चक्र संतुलित होता है। (इसके द्वादश दलोंमें जगतीके एक पादकी भावना करे।) यह भी बाहरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। तदनन्तर षोडशारचक्र है, जो सोलह दलोंसे सम्पन्न होता है। निश्चय ही पुरुष सोलह कलाओंसे युक्त है। पुरुष (परमात्मा) ही यह सब कुछ है। अतः षोडशार चक्रके अरोंको पुरुषकी कलाओंकी उपमा दी जाती है। (इसके षोडश दलोंमें पुरुषकी— अन्तर्यामी परमात्माकी सोलह कलाओंकी भावना करे।) यह भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। तत्पश्चात् बत्तीस अरोंसे युक्त अर्थात् बत्तीस दलोंवाला चक्र है। बत्तीस अक्षरों- का ही अनुष्टुप् छन्द होता है। अनुष्टुप्के अक्षरोंसे ही इसके उ० अं० ७३—