कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 632, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें५८४ - श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् - [खण्ड २
स्वरूपसे स्थित हो जाती है। साथ ही ये परमात्मा अविकल्प भी हैं—भेद और संशयसे रहित हैं, क्योंकि ये मन और वाणीके विषय नहीं हैं, चित्स्वरूप हैं। अतः ये चार रूपवाले ओंकार ही हैं। अवश्य ही यह ओंकार ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन अपने ही स्वरूपोंसे चार रूपों- वाला है, अतः तुरीय पादकी भाँति यह ओंकार भी परमात्मा ही है। क्योंकि यह सब कुछ नाम-रूपमय ही है। अर्थात् नाम वाचक है और रूप वाच्य। यदि वाच्यके चार भेद हैं तो वाचकके भी हो सकते हैं; क्योंकि उनमें भेद नहीं है। अतः जैसे परमात्माके ओत आदि चार स्वरूप हैं, वैसे ही ओंकारके भी हैं। इसलिये तुरीय, चित्स्वरूप, ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्परूप होनेके कारण ओंकार और परमात्मा दोनों परस्पर अभिन्न हैं। जैसे वैश्वानर आदिका तुरीयमें लय होता है, उसी प्रकार ओत आदिका अविकल्पमें लय होता है; अतः यह सब कुछ अविकल्परूप ही है। उसमें किसी प्रकारका कोई भी भेद नहीं है।
पाद है। जो इस प्रकार जानता है, वह आत्मा ही आत्माके द्वारा परमात्मामें पूर्णतः प्रवेश कर जाता है। यह उपासक वीर होता है, संसारमें कहीं भी उसका पराभव नहीं होता। (तुरीय परमात्माको जाननेके लिये उपर्युक्त रूपसे चिन्तन करना तो एक उपाय है ही, दूसरा भी उपाय है, उसे बताते हैं—) अथवा नृसिंहसम्बन्धी मन्त्रराज आनुष्टुभसे तुरीयको जाने। निश्चय ही यह परमात्माके स्वरूपको प्रकाशित कर देता है; क्योंकि यह सबका सहार करनेमें समर्थ (उग्र) है, परिभवको सहन न कर सकनेवाला (वीर) है, महान् प्रभु है, सर्वत्र व्यापक (विष्णु) है*। सदा उज्ज्वल- प्रकाशमय है, अविद्या और उसके कार्यसे रहित है, अपने आत्मीय जनोंका अज्ञानमय बन्धन दूर कर देता है, सर्वदा द्वैतसे शून्य है, आनन्दस्वरूप है, सबका अधिष्ठान और सन्मात्रस्वरूप है। अविद्या, तम और मोह (मल, आवरण और विक्षेप) को सर्वथा नष्ट कर डालनेवाला है तथा 'अहम्' (मै) का एकमात्र लक्ष्यार्थ सबका आत्मा है।
चतुर्थ पादके विषयमें श्रुतिका यह उपदेश है—'मात्रा- रहित ओंकार अर्थात् परमात्माके नामात्मक ओंकारका मात्रा- रहित—बोलनेमें न आ सकनेवाला निराकार स्वरूप ही (मन- वाणीका अविषय होनेके कारण) व्यवहारमे न आ सकनेवाला, प्रपञ्चसे अतीत, कल्याणमय एव अद्वितीय परमात्माका चतुर्थ
इसलिये इस मन्त्रराजको तथा इसके वाच्यार्यरूप भगवान् नृसिंहको ही सबका आत्मा एव परब्रह्म जानकर निरन्तर उनका चिन्तन करता रहे। इस प्रकार जानने तथा इसीके अनुसार उपासना करनेवाला यह पुरुष वीर एव मनुष्योंमें सिंहरूप—श्रेष्ठ होता है।
- यहाँ 'सर्वसहारसमर्थ 'आदि पदोंद्वारा मन्त्रराज आनुष्टुभकी ही व्याख्या की गयी है। आरम्भसे लेकर 'प्रभुर्व्याप्त' तक 'उग्रं वीरं महाविष्णुम्' इन तीन पदोंकी व्याख्या हो गयी है, जो स्पष्ट है। 'सदोज्ज्वल' इन पदके द्वारा 'ज्वलन्तम्' पदकी व्याख्या हुई है। यह भी स्पष्ट ही हे। 'अविद्याकार्यहीन' इसके द्वारा 'सर्वतोमुखम्' का भाव व्यक्त किया गया है। 'सर्वतोमुखम्' पद ज्ञानस्वरूपताको लक्ष्य कराता है, अत उसने द्वारा अविद्या एव उसके कार्यका निराकरण होना उचित हो है। 'स्वात्मबन्धहर' पदमें 'नृसिंहम्' पदका भाव है। 'नृसिंहम्' में दो पद हैं—'नृ' और 'सिंहम्'। गत्यर्थक 'नृ' धातुसे 'नृ' शब्द बनता है, अत 'नृ' का अर्थ है—ज्ञानस्वरूप तथा त्रिविध परिच्छेदशून्य आत्मा। 'सिंहम्' पदके दो भाग हैं—सिं+ हम्। 'षिञ् बन्धने' इस धातुमे 'सिं' बना है, अत उसका अर्थ हुआ बन्धनकारक अज्ञान। 'हृ' का अर्थ है—सहार करनेवाला। इस प्रकार 'नृसिंहम्' पदका अर्थ हुआ आत्माको बन्धनमें डालनेवाले अज्ञानका सहारका इसी भावसे 'स्वात्मबन्धहर' कहा गया है। 'भीषणम्' पदका अर्थ है डरानेवाला। डर या भय वहीं है, जहाँ द्वैत है। भगवान् नृसिंह और उनका मन्त्रराज द्वैतको भयभीत करनेवाला है, अत उनके पास द्वैत या भ्रम फटकने नहीं पाता। इसी भावको ध्यानमें रखकर 'सर्वदा द्वैतरहित' कहा गया है। 'सर्वाधिष्ठानसन्मात्र' पदसे 'मृत्युमृत्युम्' पदका भाव व्यक्त किया गया है। मृत्युमें ही सबका लय होता है, अत वही सबका अधिष्ठान है। भगवान् मृत्युके भी मृत्यु हैं, अत वे तथा उनके मन्त्र ही सर्वाधिष्ठान हो सकते हैं। 'नमामि' का अर्थ इस प्रकार है—न=नहीं है, 'मा' का =प्रमात्मक ज्ञानस्वरूप परमानन्दमय तुरीय पदका, म=हिंसाकारक अविद्या, तम और मोह जिसमें, वह, इसीको लक्ष्यमें रखकर 'निरस्ताविधातमोमोह' कहा गया है। कहा भी है—'मीति हिंसाकर नाम तमोऽज्ञानादिलक्षणम्।' 'अहम्' पदका तो स्पष्ट उल्लेख हुआ ही है।