भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 650, कुल 832 में से

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पृष्ठ 650

६०२ * श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् * [ खण्ड ९ रूप नहीं हो (क्योंकि स्वरूपभूत सत्तामात्रसे ही तुम माया- की आश्चर्यरूपतामें हेतु बनते हो, विकारको प्राप्त होकर नहीं, अतः सर्वदा एकरूप होनेके कारण तुम्हें आश्चर्य रूप भी नहीं कहा जा सकता)'-प्रजापतिने कहा । "जो कुछ बताया गया, इसे 'हाँ' कहकर 'अनुज्ञा' रूपसे स्वीकार करो और इस आत्माके विषयमे बताओ।" आत्मा ज्ञात भी है और अज्ञात भी, देवताओने उत्तर दिया और कहा- वह ऐसा भी (ज्ञात-अज्ञात भी) नहीं है। 'फिर भी उसके आत्मसिद्ध स्वरूपको तो बताओ ही।' प्रजापतिने जब यो कहा, तब देवता बोले- 'भगदन् ! हम केवल देखते ही हैं, फिर भी नहीं देखते, हम उसे कहकर बता नहीं सकते। भगवन् ! आपको नमस्कार है, हमपर प्रसन्न होइये ।' देवताओंका यह कथन सुनकर प्रजापति बोले- डरो मत, पूछो, क्या जानना चाहते हो ? देवता बोले- भगवन् ! यह अनुज्ञा क्या है ? 'यह आत्मा ही अनुज्ञा है,' प्रजापतिने कहा । तब देवता बोले-भगवन् ! आपको नमस्कार है, हम आपके ही हैं। इस प्रकार उन प्रसिद्ध प्रजापतिने देवताओंको उपदेश दिया, उपदेश दिया। इस विषयमें यह श्लोक है- ओतमोतेन जानीयादनुज्ञातारमान्तरम् । अनुज्ञामद्वयं लब्ध्वा उपद्रष्टारमाव्रजेत् । उपद्रष्टारमाव्रजेत् ॥ 'ओत (व्यापक) आत्माको ओत (प्रणव) के द्वारा जाने । फिर अनुज्ञातारूप प्रणवके द्वारा अनुज्ञाता आत्माको जाने। तत्पश्चात् अनुज्ञा-प्रणवके द्वारा अनुज्ञारूप आत्माको जाने तथा अविकल्परूप प्रणवद्वारा अविकल्परूप आत्माको जानकर उपद्रष्टा भावको प्राप्त हो-साक्षीरूपसे स्थित हो जाय।' (इस श्लोकमें आठवें और नवें खण्डोंका संक्षेपमे सार आ गया है। अन्तिम वाक्यकी पुनरावृत्ति ग्रन्थ-समाप्ति सूचित करनेके लिये है।) ॥ नवम खण्ड समाप्त ॥ ९ ॥ ॥ अथर्ववेदीय श्रीनृसिंहोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः ! ! शान्तिः ! ! ! सत्यकी जय है सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ (मुण्डक० ३।१।६) सत्यकी ही जय होती है, असत्यकी नहीं, वह देवयानमार्ग सत्यसे ही व्याप्त है, जिससे पूर्णकाम ऋषिगण गमन करते हैं, जहाँ उस सत्यस्वरूप परमात्माका परमधाम है।