भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 652, कुल 832 में से

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पृष्ठ 652

ॐ द्वितीय अध्याय शुकदेवजीको आत्माके सम्बन्धमें जनकका उपदेश जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका स्वरूप शुक नामके एक महातेजस्वी मुनीश्वर थे, जो निरन्तर आत्मानन्दके आस्वादनमे तत्पर रहते थे। उन्होंने उत्पन्न होते ही सत्यकी, तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति की । इसलिये उन महामना शुकदेवजीने अपने विवेकसे स्वयं—बिना किसी उपदेशके चिरकालतक विचारकर आत्मस्वरूपका निश्चय किया ॥१-२॥ अनिर्वचनीय होनेके कारण, अगम्य होनेके कारण और मनरूपी षष्ठ इन्द्रियमें स्थित होनेके कारण यह आत्मा अणु-परिमाण है, चिन्मात्र है, आकाशसे भी अत्यन्त सूक्ष्म है । इस परम चिद्रूपी अणुके भीतर कोटि कोटि ब्रह्माण्डरूपी रेणुकाएँ शक्ति क्रमसे उत्पन्न और स्थित होकर विलीन होती रहती हे । बाह्यशून्यताके कारण आत्मा आकाश स्वरूप है और चिदृढ़ताके कारण अनाकाशस्वरूप है, उसका निर्देश नही किया जा सकता, अतएव वह अवस्तुरूप है, उसकी सत्ता है, अतः वह वस्तुरूप है, प्रकाशात्मक होनेके कारण वह चेतन है और वेदनाका विषय न होनेके कारण वह शिलाके समान है, अपने अन्तःस्थ आत्माकाशमे वह चित्र विचित्र— नाना प्रकारके जगत्‌का उन्मेष करता है। यह विश्व उसका आत्म- प्रकाशमात्र है, अतएव उससे पृथक् नहीं है। जगद्‌भेद भी आत्मा- मे ही भासित हो रहा है, अतएव वह भेद भी आत्ममय ही है । वह सबसे सम्बद्ध है, इस दृष्टिसे उसकी सर्वत्र गति है, और उसमें गति न होनेके कारण वह कहीं जाता नहीं । उसका कोई आश्रय न होनेके कारण वह 'नास्ति' रूप है, तथा सत्वरूप होनेके कारण 'अस्ति'-रूप हे । धनदाताकी परम गति है । जो ब्रह्म आनन्द और विज्ञानस्वरूप है, चित्तके द्वारा सारे सङ्कल्पोंका परित्याग ही जिसका ग्रहण है, जाग्रत् अवस्थाकी प्रतीतिके अभावको ही जिसकी प्रतीति बुद्धिमान् लोग बतलाते हैं, जिसके सङ्कोच और विकाससे जगत्‌का प्रलय और सृजन होता है, वेदान्त वाक्योंकी जो निष्ठा है तथा वाणीके लिये जो अगोचर है, वही सच्चित्- परमानन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ, दूसरा नहीं हूँ—इस प्रकार अपनी ही सूक्ष्म बुद्धिके द्वारा श्रीशुकदेव मुनिको सब कुछ ज्ञात हो गया । स्वय प्राप्त हुए परतत्त्वमें वे अविश्रान्त-निरन्तर सलग्न मनसे स्थित हुए । 'यही वस्तु है, वह नहीं' इस प्रकारका विश्वास आत्मतत्त्वमें उनको प्राप्त हुआ और तब, जिस प्रकार जलदके धाराप्रपातसे तृप्त हुए चातकका चापल्य दूर हो जाता है, उसी प्रकार नाना प्रकारके भोगोंसे उत्पन्न होनेवाले विषय तापत्रयसे विरत होकर उनका चित्त कैवल्य अवस्थाको प्राप्त हो गया ॥ ३-१३ ॥ एक बार उन विगल प्रसादानन् शुकदेवजीने मेरु पर्वतपर एकान्तमें स्थित हो अपन पिता श्रीकृष्णद्वैपायन मुनिसे भक्ति- पूर्वक प्रश्न किया—'मुनीश्वर । यह जगत् प्रपञ्च कैसे उत्पन्न हुआ, किस प्रकार विलीन होता है ? यह क्या है, किसका है, कब हुआ है ? बतलाइये ।' इस प्रकार पूछनेपर आत्मज्ञानी व्यासजी भगवान्‌ने शुकको यथावत् सारी बातें बतलायीं, किंतु 'ये सब बाते तो मुझे पहलेसे ही ज्ञात है' यो समझकर शुकदेवजीने पिताकी बातोंको अपनी बुद्धिमे वैसा आदर नहीं दिया । इस प्रकार शुकदेवजीके अभिप्राय- को समझकर भगवान् व्यासजीने शुकदेव मुनिसे कहा, 'मैं तत्त्वतः इन बातोको नहीं जानता । मिथिलापुरीमे जनक नामके एक राजा है, वे इन सब बातोंको भलीभाँति जानते हैं, पुत्र ! तुम उनसे सब कुछ प्राप्त कर सकते हो ।' पिताके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर श्रीशुकदेवजीने सुमेरु पर्वतसे उतरकर भूतलकी ओर प्रयाग किया ओर वे जनकके द्वारा परिपालिक्त विदेहनगरीमे जा पहुँचे ॥ १४-२० ॥ जब द्वारपालोंने महात्मा जनकको यह समाचार दिया कि 'राजन् ! राजद्वारपर महर्षि व्यासके पुत्र श्रीशुकदेव मुनि उपस्थित है,' तब शुककी परीक्षाके लिये राजाने अवज्ञापूर्वक केवल इतना ही कहा कि 'वे वही ठहरें' इसके बाद राजा सात दिन चुप रहे । तदनन्तर राजा जनकने शुकदेवजीको राज प्राङ्गणमे बुलवाया। वहाँ भी राजा सात दिनोंतक उसी प्रकार उदासीन रहे । तदनन्तर राजाने उनको अन्त:पुरके आँगनमे बुलवाया, और वहाँ भी सात दिनोंतक राजा शुकदेवजीके सामने नही आये । महाराज जनकने अन्त:पुरमे युवती स्त्रियों, नाना प्रकारके भोजन तथा भोग्य-पदार्थोंके द्वारा सौम्यवदन शुकदेवजीका आदर-सत्कार किया। वे भोग और भोज्य पदार्थ व्यास पुत्र श्रीशुकदेवके मनको उसी प्रकार नहीं हर सके, जिस प्रकार मन्द पवन दृढतापूर्वक स्थित हुए पर्वतको चलायमान नहीं कर सकता । शुकदेवजी असङ्ग, समभावापन्न, निर्विकार, मौन और प्रसन्नचित्त होकर निर्मल पूर्णचन्द्रके समान स्थित रहे ॥ २१-२७ ॥

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