कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 654, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६०६ * महोपनिषद् * [ अध्याय २ भी निष्कल रहता है, चित्तके होते हुए भी निश्चित्त रहता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सम्पूर्ण अर्थ-जालके मध्य व्यवहार करता हुआ उनसे उसी प्रकार निःस्पृह रहता है, जैसे पराये धनके विषयमें मनुष्य निःस्पृह रहता है, तथा जो आत्मामे ही पूर्णताका अनुभव करता है, वह जीवन्मुक्त है॥ ४२-६२॥ 'शरीरके काल कवलित होनेपर वह जीवन्मुक्त अवस्थाको छोड़कर गतिहीन पवनके समान विदेहमुक्त अवस्थाको प्राप्त होता है। विदेहमुक्त अवस्थामें जीवकी न उन्नति होती है न अवनति होती है और न उसका लय ही होता है' वह अवस्था न सत् है, न असत् है और न दूरस्थ है। उसमें न अहम्भाव है और न परायाभाव है। विदेहमुक्ति गम्भीर, स्तब्ध अवस्था होती है; उसमें न तेज व्याप्त होता है और न अन्धकार। उसमें अनिर्वचनीय, और अभिव्यक्त न होनेवाला एक प्रकारका सत् अवशिष्ट रहता है। वह न शून्य होता है न आकारयुक्त होता है, न दृश्य होता है और न दर्शन होता है। उसमे ये भूत और पदार्थोंके समूह नहीं होते-केवल सत् अनन्तरूपमें अवस्थित होता है। वह ऐसा अद्भुत तत्त्व होता है कि जिसके स्वरूपका निर्देश नहीं किया जा सकता। उसकी आकृति पूर्णसे भी पूर्णतर होती है। वह न सत् होता है न असत्, और न सत्-असत् दोनों होता है; न भाव होता है और न भावना, वह चेतनामात्र होता हैपरन्तु चित्तविहीन होता है, अनन्त होता है। अजर होता है परंतु शिवस्वरूप, कल्याणकारी होता है। उसका आदि, मध्य और अन्त नहीं होता। वह अनादि तथा दोषहीन होता है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शनकी त्रिपुटीमे वह केवल दर्शनस्वरूप माना जाता है । शुकदेव मुनि ! इस विषयमें इसके अतिरिक्त कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता । तुमने इस तत्त्व- को स्वय ही जान लिया है तथा, अपने पितासे भी सुना है कि जीव अपने सङ्कल्पसे ही बन्धनमे पड़ता है और सङ्कल्पहीन होनेपर मुक्त हो जाता है। अतएव तुमने स्वय उस तत्त्वको जान लिया, जिसको जान लेनेपर इस संसारमें महात्माओं- को समस्त दृश्योंसे अथवा भोगोंसे विरति उत्पन्न हो जाती है। तुमने पूर्ण चेतनाम स्थिति लाभकर समस्त प्राप्तव्य वस्तुको प्राप्त कर लिया है। तुम तपःस्वरूपमे स्थित हो। ब्रह्मन् ! तुम मुक्त हो, भ्रान्तिको छोड़ो । शुकदेवजी ! बाहर तथा अत्यन्त बाहर, अन्तःकरणमें तथा उसके भी भीतर देखते हुए भी तुम नहीं देखते, तुम पूर्ण कैवल्य-स्थितिमे साक्षि- मात्र रहते हो' ॥ ६३-७३ ॥ तदुपरान्त श्रीशुकदेवजी शोक, भय और श्रमसे रहित होकर, संशयहीन और निष्काम हो, परतत्त्वस्वरूप आत्मामें स्थित होकर चुपचाप विश्रामको प्राप्त हुए । अखण्ड समाधि- के लिये वे सुमेरु पर्वतके शिखरकी ओर लौट गये । वहाँ सहस्रों वर्षोंतक, स्नेहहीन दीपकके समान उन्होंने आत्मदेशमे स्थित हो निर्विकल्प समाधिके द्वारा शान्तिलाभ किया । सङ्कल्परूपी दोषोंसे रहित, शुद्धस्वरूप, पवित्र और निर्मल आत्मपदमें वे महात्मा शुकदेवजी वासनाविहीन होकर उसी प्रकार एकत्वको प्राप्त हुए, जिस प्रकार सलिल-कण समुद्रमें विलीन होकर उसमें एकताको प्राप्त होता है ॥ ७४-७७ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥