कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 692, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६४४ * सरस्वतीरहस्योपनिषद् * 'जो नाम-जाति आदि भेदोंसे अष्टधा विकल्पित हो रही | नहीं सुन पाता, किंतु किसी किसीके लिये तो ये वाग्देवी हैं तथा साथ ही निर्विकल्पस्वरूपमे भी व्यक्त हो रही हैं, वे | अपने स्वरूपको उसी प्रकार प्रकट कर देती हैं, जैसे पतिकी सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' | कामना करनेवाली सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित भार्या अपनेको 'छ्रीं' यद् वाग्वदन्त्यविचेतनानि | पतिके समक्ष अनावृतरूपमें उपस्थित करती है ॥ ९॥ राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा। | अम्बितमे—इस मन्त्रके गृत्समद ऋषि हैं, अनुष्टुप् चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि | छन्द है, सरस्वती देवता हं, ऐं—यह बीज, शक्ति और क्व स्विद्द्या परमं जगाम ॥७॥ | कीलक तीनो है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे । छ्रीं—राष्ट्री अर्थात् दिव्यभावको प्रकाशित करनेवाली | 'ब्रह्मज्ञानीलोग दम नाम-रूपात्मक अखिल प्रपञ्चको तथा देवताओंको आनन्दमग्न कर देनेवाली देवी वाणी | जिनमें आविष्टकर पुन' उनका ध्यान करते हैं, वे एकमात्र जिस समय अज्ञानियोको ज्ञान देती हुई यज्ञमें आसीन | ब्रह्मस्वरूपा सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' (विराजमान) होती हैं, उस समय वे चारो दिशाओके लिये | 'ऐं' अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अन्न और जलका दोहन करती ह । इन मध्यमा वाक्में जो | अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥१०॥ श्रेष्ठ है, वह कहाँ जाता है? ॥ ७॥ | ऐं—(परम कल्याणमयी )—माताओमें सर्वश्रेष्ठ, 'देवी वाचं' इस मन्त्रके भार्गव ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द | नदियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा देवियोंमें सर्वश्रेष्ठ हे सरस्वती देवी ! है, सरस्वती देवता हैं, 'सौ'—यह बीज, शक्ति और कीलक | धनाभावके कारण हम अप्रशस्त (निन्दित) मे हो रहे हैं, मा! तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे । | हमे प्रशस्ति (धन-समृद्धि) प्रदान करो ॥ १० ॥ 'व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले देवादि समस्त प्राणी | जो ब्रह्माजीके मुखरूपी कमलोंके वनमें विचरनेवाली जिनका उच्चारण करते है, जो सब अभीष्ट वस्तुओंको दुग्धके | राजहंसी हं, वे सब ओरसे श्वेत कान्तिवाली सरस्वतीदेवी हमारे रूपमें प्रदान करनेवाली कामधेनु हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी | मनरूपी मानसमें नित्य विहार करें । हे काश्मीरपुरमें निवास रक्षा करें।' | करनेवाली शारदादेवी ! तुम्हें नमस्कार है । म नित्य तुम्हारी 'सौ.' देवी वाचमजनयन्त देवास्तां | प्रार्थना करता हूँ । मुझे विद्या (ज्ञान) प्रदान करो। अपने विश्वरूपा पशवो वदन्ति । | चार हाथोमे अक्षसूत्र, अङ्कुश, पाश और पुस्तक धारण सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना | करनेवाली तथा मुक्ताहारसे सुशोभित सरस्वती देवी मेरी धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥८॥ | वाणीमे सदा निवास करें । शङ्खके समान सुन्दर कण्ठ सौ—प्राणरूप देवोंने जिस प्रज्ञागमान वैखरी वाणीको | एव सुन्दर लाल ओठोंवाली, सब प्रकारके भूषणोंसे विभूषिता उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते है । वे | महासरस्वती देवी मेरी जिह्वाके अग्रभागमे सुखपूर्वक कामधेनुतुल्य आनन्ददायक तथा अन्न और बल देनेवाली | विराजमान हों । जो ब्रह्माजीकी प्रियतमा सरस्वतीदेवी वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतियोंसे सन्तुष्ट होकर हमारे | श्रद्धा, धारणा और मेधा-स्वरूपा है, वे भक्तोंके जिह्वाग्रमे समीप आयें ॥८॥ | निवासकर शम दमादि गुणोंको प्रदान करती हैं। जिनके 'उत त्व ०' इस मन्त्रके बृहस्पति ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द | केश पाश चन्द्रकलासे अलङ्कृत है तथा जो भव-सन्तापको है, सरस्वती देवता हैं, 'स'—यह बीज, शक्ति और कीलक | शमन करनेवाली सुधा-नदी हैं, उन सरस्वतीरूपा भवानीको तीनों है। (विनियोग पूर्ववत् है) मन्त्रके द्वारा न्यास करे । | मै नमस्कार करता हूँ । जिसको कवित्व, निर्भयता, भोग और 'जिनको ब्रह्मविद्यारूपसे जानकर योगी सारे बन्धनोंको | मुक्तिकी इच्छा हो, वह इन दस मन्त्रोंके द्वारा सरस्वतीदेवीकी नष्ट कर डालते और पूर्ण मार्गके द्वारा परम पदको प्राप्त होते | भक्तिपूर्वक अर्चना करके स्तुति करे । भक्ति और श्रद्धापूर्वक हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करे।' | सरस्वतीदेवीकी विधिपूर्वक अर्चना करके नित्य स्तवन करनेवाले 'स' उत त्व पश्यन्न ददर्श वाच- | भक्तको छ. महीनेके भीतर ही उनकी कृपाकी प्रतीति हो जाती मुत त्व. शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । | है। तदनन्तर उसके मुखसे अनुपम अप्रमेय गद्य-पद्यात्मक शब्दोंके उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे | रूपमें ललित अक्षरोंवाली वाणी स्वयमेव निकलने लगती है । जायेव पत्य उशती सुवासा ॥९॥ | प्रायः सरस्वतीका भक्त कवि बिना दूसरोंसे सुने हुए ही ग्रन्थोंके स—कोई-कोई वाणीको देखते हुए भी नही देखता | अभिप्रायको समझ लेता है। ब्राह्मणो ! इस प्रकारका निश्चय (समझकर भी नही समझ पाता), कोई इन्हें सुनकर भी | सरस्वती देवीने अपने श्रीमुखसे ही प्रकट कियाथा। ब्रह्माके