भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 696, कुल 832 में से

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पृष्ठ 696

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय देव्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! देवीकी ब्रह्मस्वरूपता, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति, देवी-महिमा और इसके पाठका फल


[बायाँ स्तम्भ] सभी देवता, देवीके समीप जाकर, प्रार्थना करने लगे— 'महादेवि ! तुम कौन हो ?' ॥ १ ॥ उन्होंने कहा-'मैं ब्रह्मस्वरूपा हूँ। मुझसे प्रकृति पुरुषात्मक कारणरूप और कार्यरूप जगत् उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द और अनानन्दरूपा हूँ । मैं विज्ञान और अविज्ञानरूपा हूँ । अवश्य जाननेयोग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत महाभूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य जगत् मैं ही हूँ। वेद और अवेद मैं हूँ। विद्या और अविद्या भी मैं, अजा और अनजा (प्रकृति और उससे भिन्न) भी मैं हूँ, नीचे ऊपर, अगल-बगल भी मे ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं- के रूपमें सञ्चार करती हूँ । मैं आदित्यों और विश्वेदेवोंके रूपोंमें फिरा करती हूँ । मैं मित्र और वरुण दोनोंका, इन्द्र एव अग्निका और दोनों अश्विनीकुमारोंका भरण पोषण करती हूँ । मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भगको धारण करती हूँ । त्रैलोक्यको आक्रान्त करनेके लिये विस्तीर्ण पादक्षेप करनेवाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापतिको मै ही धारण करती हूँ । देवोंको हवि पहुँचानेवाले और सावधानीसे सोमरस निकालनेवाले यजमानके लिये हविर्द्रव्योंसे युक्त धनको धारण करती हूँ। मे सम्पूर्ण जगत्की ईश्वरी, उपासकोंको धन देनेवाली, ज्ञानवती और यज्ञाहोंमें (यजन करने योग्य देवोंमें) मुख्य हूँ। मैं ही इस जगत्‌के पितारूप आकाशको सर्वाधिष्ठान-


[दायाँ स्तम्भ] स्वरूप परमात्माके ऊपर उत्पन्न करती हूँ । मेरा स्थान आत्मस्वरूपको धारण करनेवाली बुद्धिवृत्तिमें है। जो इस प्रकार जानता है, वह दैवी सम्पत्ति लाभ करता है' ॥२-७॥ तत्र उन देवोंने कहा—'देवीको नमस्कार है। बड़े-बड़ोंको अपने-अपने कर्तव्यमे प्रवृत्त करनेवाली कल्याणकर्त्री महादेवीको सदा नमस्कार है। गुण-साम्यावस्थारूपिणी मङ्गलमयी देवीको नमस्कार है । नियमयुक्त होकर हम उन्हे प्रणाम करते ह । उन अग्निके से वर्णवाली, ज्ञानसे जगमगानेवाली, दीप्तिमती, कर्मफलप्राप्तिके हेतु सेवन की जानेवाली दुर्गा-देवीकी हम शरणमें हैं । असुरोका नाश करनेवाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है। प्राणरूप देवोंने जिस प्रकाशमान वैखरी वाणीको उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते हे । वे कामधेनु- तुल्य आनन्ददायक और अन्न तथा बल देनेवाली वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतिसे सतुष्ट होकर हमारे समीप आयें । कालका भी नाश करनेवाली, वेदोंद्वारा स्तुत विष्णुशक्ति, स्कन्दमाता ( शिवशक्ति ), सरस्वती ( ब्रह्मशक्ति ), देवमाता अदिति और दक्ष कन्या ( सती ), पापनाशिनी एव कल्याण- कारिणी भगवतीको हम प्रणाम करते हैं। हम महालक्ष्मीको जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणीका ही ध्यान करते हे । वे देवी हमें उस विषयमें ( ज्ञान-ध्यानमें ) प्रवृत्त करें । हे दक्ष ! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुईं और