भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 783, कुल 832 में से

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पृष्ठ 783

अध्याय ७] - * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२७ आनन्दस्वरूप, अनिर्वचनीय, अमितबोधसागर, अपार आनन्द- का समुद्र, विजातीय विशेषताओं (विशेषों) से रहित, सजातीय विशेषताओंसे युक्त, निरवयव, निराधार, निर्विकार, निरञ्जन, अनन्त, ब्रह्मानन्द-समष्टिका घनीभाव, परमचिद्विलासका समष्टि- स्वरूप, निर्मल, निष्कलङ्क एव दूसरे किसीके आश्रयसे रहित है। अत्यन्त निर्मल अनन्तकोटि सूर्योंके प्रकाश उसके सम्मुख एक चिनगारीके समान हैं, जो अनन्त उपनिषदोंका अर्थ- स्वरूप, समस्त प्रमाणोंसे अतीत, मन एव वाणीका अविषय और नित्यमुक्तस्वरूप है। उसका कोई आधार नहीं है, वह आदि-मध्य- अन्तरहित, कैवल्यरूप, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, महान्से भी परम महान्, अमित आनन्दस्वरूप, शुद्ध बोध- आनन्द-ऐश्वर्यरूप, अनन्त आनन्दमय स्वरूपोंका समष्टिरूप, अविनाशी, अनिर्देश्य, कूटस्थ (निर्विकार), अचल, ध्रुव, दिशा- देश एव कालसे रहित, भीतर और बाहरसे भी सम्पूर्ण जगत्- को व्याप्त करके परिपूर्ण, परम योगियोंद्वारा अन्वेषणीय, देश- काल तथा वस्तुके परिच्छेदसे रहित, निरन्तर नूतन, नित्य परिपूर्ण, अखण्ड आनन्द अमृतरूप, शाश्वत, परमपद, निरतिशय आनन्दमय अनन्त त्रिगुत्यवर्तोंके समान, अद्वितीय, तथा अपने ही प्रकाशसे निरन्तर प्रकाशित है। (वहाँ) परमानन्दस्वरूप अपरिच्छिन्न अनन्त परम ज्योति, जो शाश्वत है, निरन्तर प्रकाशमान है ॥ १७ १८ ॥ 'उसके भीतर बोधानन्द-महोज्ज्वल, नित्य मङ्गल-मन्दिर, चिन्मय समुद्रके मन्थनसे उत्पन्न चित्साररूप, अनन्त आश्चर्योका सागर, अमित तेजोग्राशिके अन्तर्गत विशेष तेजः- स्वरूप, अनन्त आनन्द-प्रवाहोंसे अलङ्कृत निरतिशय आनन्द- सागर-स्वरूप, निरुपम, नित्य, निर्दोष, निरतिशय, निस्सीम तेजोगशिरूप, निरतिशय आनन्दस्वरूप सहस्रों प्राकारो (चहारदीवारियों) से अलङ्कृत, शुद्ध बोधमय भवनसमूहोंसे भूषित, चिदानन्दमय अनन्त दिव्य उपवनोंसे सुशोभित, निरन्तर होनेवाली अपार पुष्पवर्षासे चारों ओरसे व्याप्त धाम है। वही त्रिपाद्विभूति वैकुण्ठ स्थान है। 'वही परम कैवल्य है। वही अबाधित परमतत्त्व है। वही अनन्त उपनिषदोंद्वारा अन्वेषणीय पद है। वही समस्त परम- योगियों तथा मुमुक्षुओं द्वारा चाहा जाता है। वही घनीभूत सत् है। वही घनीभूत चित् है। वही घनीभूत आनन्द है। वही घनीभूत शुद्धबोधरूप अखण्ड आनन्दमय ब्रह्मचैतन्यका अधिदेवता स्वरूप है। सबका अधिष्ठान, अद्वय परब्रह्मका विहार-मण्डल, निरतिशय आनन्दरूप तेजोमण्डल, अद्वैत परमानन्दरूप परब्रह्मका परम अधिष्ठानरूप मण्डल, निरतिशय परमानन्दका परममूर्तस्वरूप मण्डल, अनन्त श्रेष्ठ मूर्तियोंका समष्टिरूप मण्डल, निरतिशय परमानन्दरूप-स्वरूप परब्रह्मकी परममूर्त्तिरूप परमतत्त्वके विलायका स्वरूपभूत मण्डल, बोधानन्दमय अनन्त परम विलासोंकी विभूतियोंका समष्टिरूप मण्डल, अनन्त चिद्विलासकी विभूतियोंको समष्टिरूप मण्डल, अखण्ड शुद्ध चैतन्यका निजमूर्त्तिरूप विग्रह, वाणीके अगोचर अनन्त शुद्धबोधका विग्रहरूप, अनन्त आनन्दसमुद्रों- का समष्टिरूप, अनन्त बोधस्वरूप पर्वतो तथा अनन्त बोधानन्द- रूप पर्वतोंसे अधिष्ठित, निरतिशय आनन्द एव परम मङ्गलमय स्वरूपोंका समष्टिरूप, अखण्ड अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मकी परममूर्तिके परम तेजःपुञ्जका पिण्डरूप, चिद्रूप (ज्ञानस्वरूप) सूर्यका मण्डलरूप तथा बत्तीस विभिन्न व्यूहोंसे अधिष्ठित है। केशवादि चौबीस व्यूह, सुदर्शन आदिके न्यास मन्त्र, सुदर्शनादि यन्त्रोंका उद्धार, अनन्त-गरुड़-विष्वक्सेनादि (पार्षद) तथा निरतिशय आनन्दरूप भी उसीमे ह ॥ १९-२० ॥ 'उपर्युक्त आनन्द व्यूहके बीचमे सहस्रकोटि योजन विस्तीर्ण उन्नत चिन्मय प्रासाद है। (वह) ब्रह्मानन्दमय करोड़ों विमानसे युक्त एव अत्यन्त मङ्गलस्वरूप है। अनन्त उपनिषदोंके अर्थ- स्वरूप उपवन-समुदायोंने भरा है। सामवेदरूपी हसोके कलनादसे उसकी अत्यन्त शोभा होती है। आनन्दमय अनन्त शिखरोंसे यह अलङ्कृत है। चिदानन्द रसके झरनोंसे व्याप्त है। अखण्डा- नन्दरूप तेजोगशिके भीतर स्थित है। अनन्त आनन्दमय आश्चर्योंका समुद्र है। उसके भीतरी भागमें निरतिशय आनन्दस्वरूप प्रणव नामक विमान है, जिसका प्राकार अनन्तकोटि सूर्योंके प्रकाशसे भी अतिशय प्रकाशमय है (वह विमान) आनन्दमय शतकोटि शिखरोंसे जगमगा रहा है। उसके भीतर बोधानन्द-पर्वतके ऊपर अष्टाक्षरीमण्डप सुशोभित है। उस (मण्डप) के मध्यमे आनन्दवनसे विभूषित चिदानन्दमयी वेदिका है। उसके ऊपर निरतिशयानन्दस्वरूप तेजोगशि प्रज्वलित हो रही है। उसके भीतर अष्टाक्षरी पद्मसे विभूषित चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप पद्म) की प्रणवरूपी कर्णिकापर चिन्मय सूर्य, चन्द्र तथा अनिके मण्डल (क्रमशः एकके ऊपर एक) प्रज्वलित हैं। वहाँ अखण्ड आनन्दरूप तेजोगशिके भीतर परम मङ्गलाकार अनन्तासन विराजमान है। उसके ऊपर महायन्त्र प्रज्वलित है। निरतिशय ब्रह्मानन्दकी परममूर्त्तिरूप वह महायन्त्र समस्त ब्रह्मतेजकी राशिका समाष्टस्वरूप, चित्स्वरूप, निर्मल, परब्रह्म- स्वरूप, एव परब्रह्मका परम रहस्यमय कैवल्यरूप है।

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