भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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( ६ )

Left Columnपृष्ठ-संख्या
१२. अश्वपति और औपमन्यवका संवाद... ४३७
१३. अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद... ४३७
१४. अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद... ४३७
१५. अश्वपति और जनका संवाद४३७
१६. अश्वपति और बुडिलका संवाद... ४३८
१७ अश्वपति और उद्दालकका संवाद. ४३८
१८. अश्वपतिका वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमे उपदेश... ४३८
१९. 'प्राणाय स्वाहा' से पहली आहुति... ४३८
२०. 'व्यानाय स्वाहा' से दूसरी आहुति.. ४३८
२१. 'अपानाय स्वाहा' से तीसरी आहुति४३९
२२ 'समानाय स्वाहा' से चौथी आहुति४३९
२३. 'उदानाय स्वाहा'से पाँचवीं आहुति४३९
२४. भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये इस प्रकार हवन करनेका फल... ४३९
( ६ ) षष्ठ अध्याय.. ४४०
१. आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुसे प्रश्न४४०
२. सद्रूप परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति. ४४०
३. आण्डज, जीवज और उद्भिज्जरूपमें त्रिविध सृष्टि... ... ४४०
४. त्रिवृत्करण... ... ४४१
५ मन अन्नमय, प्राण जलमय और वाक् तेजोमय है... ४४१
६. मथे जाते हुए दहीका दृष्टान्त.. ४४१
७. मनकी अन्नमयताका निश्चय४४२
८. सत्—आत्मा ही सबका मूल है.. ४४२
९. मधुका दृष्टान्त... ... ४४३
१० नदियोंका दृष्टान्त... ... ४४३
११. वृक्षका दृष्टान्त... ४४३
१२. वट बीजका दृष्टान्त... ४४३
१३. नमकका दृष्टान्त... ४४४
१४. आँख बँधे हुए पुरुषका दृष्टान्त. ४४४
१५. मुमूर्षु का दृष्टान्त४४४
१६. मिथ्या ज्ञानी और सच्चे ज्ञानीकी पहचान... ... ४४५
( ७ ) सप्तम अध्याय... ४४६
१. नामकी ब्रह्मरूपमे उपासना... ४४६
२. वाक्‌की ,, ,,. . ४४६

Right Columnपृष्ठ-संख्या
३. मनकी ब्रह्मरूपमें उपासना... ४४७
४. सङ्कल्पकी ,, ,,.. ४४७
५. चित्तकी ,, ,,... ४४७
६. ध्यानकी ,, ,,... ४४७
७. विज्ञानकी ,, ,,.. ४४८
८. बलकी ,, ,,. ४४८
९. अन्नकी ,, ,,... ४४८
१०. जलकी ,, ,,... ४४९
११. तेजकी ,, ,,... ४४९
१२. आकाशकी ,, ,,... ४४९
१३ स्मरणकी ,, ,,... ४४९
१४ आशाकी ब्रह्मरूपसे उपासना... ४५०
१५ प्राणकी ,, ,,. ४५०
१६. सत्य ही विशेषरूपसे जिज्ञास्य है... ४५०
१७. विज्ञान ही ,, ,,... ४५०
१८. मति ही ,, ,,... ४५१
१९. श्रद्धा ही ,, ,,. ४५१
२०. निष्ठा ही ,, ,,... ४५१
२१. कृति ही ,, ,,... ४५१
२२. सुख ही ,, ,,.. ४५१
२३. भूमा ही ,, ,,... ४५१
२४. भूमा ही अमृत है... ४५१
२५. भूमा ही सर्वत्र सब कुछ और आत्मा है.. ४५२
२६. आत्मदर्शनसे सबकी प्राप्ति, आहारशुद्धि- से क्रमशः अविद्याकी निवृत्ति.. ४५२
( ८ ) अष्टम अध्याय.. ४५३
१. आत्मा ही सत्य है ..... ४५३
२ आत्मज्ञानीकी सङ्कल्पसिद्धि. ४५३
३. ब्रह्मकी प्राप्तिसे सबकी प्राप्ति, ब्रह्म हृदयमें ही है४५४
४. आत्माकी महिमा और ब्रह्मचर्यसे ब्रह्मलोककी प्राप्ति.. ४५४
५ ब्रह्मचर्यकी महिमा... ४५४
६ हृदयगत नाडियों ही उत्क्रमणका मार्ग हैं४५५
७. इन्द्र और विरोचनको प्रजापतिका उपदेश. ४५५
८. विरोचनका भ्रमपूर्ण सिद्धान्त लेकर लौट जाना... ... ४५६
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