कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 806, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७५० * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ५
और इन्द्रियोंको सदा अपने वशमे रक्खे । जो सन्यासी घरसे निकलकर वनका आश्रय ले इन्द्रिय-संयमपूर्वक आनन्दका अनुष्ठान करता है और कालकी प्रतीक्षा करता हुआ विचरता रहता है, वह निश्चय ही ब्रह्मभावको प्राप्त करनेका अधिकारी होता है। जो मुनिसम्पूर्ण भूतोको अभय-दान करके विचरता है, उसे भी किसी प्राणीसे कहीं भय उत्पन्न नहीं होता। जो मन और अहङ्कारका त्याग करके द्वन्द्वजनित विकारोसे रहित हो जाता है, जिसके मनके संदेह नष्ट हो जाते हैं, जो न तो किसीपर क्रोध करता न किसीसे द्वेष रखता और न वाणीसे कभी असत्य ही बोलता है; जो पुण्य-स्थानोमे विचरता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा समय प्राप्त होनेपर भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता है वह ब्रह्मभावको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। संन्यासी वानप्रस्थ और गृहस्थोंसे कभी संसर्ग न रक्खे । वह इस बातको चाहता रहे कि जिससे उसकी जीवन- चर्या दूसरोपर प्रकट न हो। संन्यासीने हर्षवा आवेश नहीं होना चाहिये। जैसे कीट सदा चलते रहते हैं उसी प्रकार सन्यासी भी सूर्यके दिखाये हुए मार्गसे पृथिवीपर विचरतारहे अर्थात् रातको न चले ॥ ४१-४६ ॥ 'दम्भात्से युक्त, हिंसासे युक्त तथा लोक संग्रहसे युक्त जो-जो कर्म हैं उनको सन्यासी न तो स्वय करे और न दूसरोसे ही कराये। असत् शास्त्रोने कभी आसक्त न हो। कोई जीविकाका साधनभूत कर्म करके जीवन-निर्वाह न करे। अनावश्यक बात करना और तर्क करना छोड़ दे। वादी और प्रतिवादीमेंसे किसीका पक्ष ग्रहण न करे। शिष्योंका संग्रह न करे। बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे तथा अपने पक्षकी सिद्धिके लिये लौकिकवाक्यकी व्याख्याका उपयोग न करे। नये-नये आयोजन कभी न करे-सर्वथा निःसङ्कल्प होकर रहे। वह अपने आश्रमके चिह्नविशेष तथा अपने गूढ़ अभिप्रायको दूसरोपर प्रकट न होने दे। मुनि होकर भी उन्मत्त और बालककी भाँति चेष्टा करे। विद्वान् होते हुए भी मूर्खकी भाँति रहे। मनुष्योके समक्ष उन्हींकी दृष्टिके अनुसार अपनेको प्रदर्शित करे। दृष्ट न तो कुछ करे न कुछ बोले और न भले अथवा बुरेका चिन्तन ही करे। अपने आत्मामे ही रमण करता रहे। सन्यासी मुनि इसी वृत्तिसे रहकर जडकी भाँति सर्वत्र विचरतारहे। इन्द्रियोंको सयममें रखते हुए आसक्तिका सर्वथा त्याग करके वह अकेला ही इस पृथिवीपर भ्रमण करे। आत्मामे ही क्रीडा और आत्मामें ही रमण करने- वाला मनस्वी पुरुष सर्वत्र समान दृष्टि रक्खे । विद्वान् होकर भी बालककी भाँति क्रीडा करे। कार्यकुशल होकर भी मूर्खकी भाँति आचरण करे उन्मत्तकी भाँति बात करे और वेदोका विद्वान् होकर भी गोकी भाँति आचरण करे अर्थात् यह हो और यह न हो-इस बातके लिये कोई आग्रह न रक्खे । दुष्ट पुरुषोंके आक्षेप करने, अपमान करने, वञ्चना एवं दोषारोपण करनेपर भी सम रहे। उनके मारने, बाँध रखने या वृत्तिमे बाधा डालकर कष्ट पहुँचानेपर भी वह विचलित न हो। मूर्ख लोग शरीरपर या आसनपर मल- मूत्रका त्यागकर दें अथवा और भी अनेक प्रकारके कष्ट देकर तंग करें, तो भी कल्याणकामी पुरुष चुपचाप सहन करे। संकटमें पड़नेपर भी वह अपने आत्माके द्वारा अपना ही उद्धार करे। लोगोंसे मिला हुआ सम्मान योग-सम्पत्तिकी बड़ी भारी हानि करता है। साधारण लोगोंद्वारा अपमानित योगी योगसिद्धिको अवश्य प्राप्त कर लेता है। योगी पुरुष सत्पुरुषोंके धर्मको कलङ्कित न करते हुए अवश्य ही ऐसा आचरण करे, जिससे साधारण लोग उसका अपमान ही करें और उसके सम्पर्कमें न आवें। सन्यासी योगयुक्त होकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा जरायुज और अण्डज आदि किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करे तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे। काम, क्रोध, घमंड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उनका परित्याग करके सन्यासी निर्भय हो जाता है ॥ ४७-५९॥ 'भिक्षाका अन्न भोजन करना मौन रहना, तपस्या करना, विशेषतः ध्यानमे लगे रहना, उत्तम ज्ञान प्राप्त करना और वैराग्यवान् होना-यह भिक्षुका धर्म माना गया है। गेरुआ वस्त्र पहनकर सन्यासी सदा ध्यानयोगमे तत्पर रहे। गाँवके किनारे, वृक्षके नीचे अथवा किसी देवालयमे निवास करे। वह नित्य भिक्षाके अन्नसे ही जीवन निर्वाह करे। किसी एकके अन्नका भोजन तो वह कभी न करे। बुद्धिमान् पुरुष प्रतिदिन अपने आश्रमोचित आचारका पालन करे और तबतक करता रहे जबतक अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध न हो जाय। अन्त करण शुद्ध हो जानेपर वह संन्यास लेकर जहाँ कहीं भी स्वेच्छानुसार विचरण करे। सन्यासी बाहर और भीतर-सर्वत्र नारायणका दर्शन करते हुए वायुकी भाँति पाप-सम्पर्कसे रहित होकर मौनभावसे सब ओर विचरता रहे। वह सुख-दुःखमे समान भावसे रहे। मनमें क्षमा-भाव रक्खे । हाथपर जो कुछ आ जाय, उसीको भोजन करे। कहीं भी बैर न रखते हुए ब्राह्मण गौ, घोडे और मृग आदि सभी प्राणियोंमे समदृष्टि