कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७९४ -: महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति :- अत्र प्रश्न होता है यदि वह ज्ञानके योग्य है तो सभी लोग उसे क्यों नहीं जान सकते ? इसके उत्तरमें कहते हैं— 'ज्ञानगम्यम्'—वह ज्ञानगम्य है अर्थात् 'अमानित्व' से लेकर 'तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्' (गीता १३ । ७—११) पर्यन्त जिस साधन-कलापको ज्ञानका हेतु कहा है, ज्ञानशब्दवाच्य उन साधन-समूहोंसे ही आत्मा गम्य ( प्राप्य ) है; अन्यथा उसे नहीं प्राप्त किया जा सकता। फिर प्रश्न होता है कि यदि आत्मा साधनोंसे ही गम्य होता है तो क्या वह किसी दूर स्थानमे मिलेगा ? इसका उत्तर है—नहीं 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्'—वह सबके हृदयमें अर्थात् निखिल प्राणियोंकी बुद्धिरूप हृदय-गुहा- मे ही स्थित है। सूर्यके प्रकाशके सर्वत्र सामान्यभावसे रहने- पर भी जैसे वह दर्पण किंवा सूर्यकान्तमणि आदिमें विशेष रूपसे अभिव्यक्त होता है, उसी प्रकार वह आत्मा भी सर्वत्र सामान्यभावसे रहनेपर भी उस हृदयकन्दरारूप बुद्धि-गुहामे विशेष रूपसे प्रकाशित होता है। वह वस्तुतः व्यवधानरहित है. परन्तु भ्रान्ति ( अविद्या ) के कारण व्यवहित प्रतीत होता है तथा सब प्रकारके भ्रमका कारण जो अज्ञान है, उसकी निवृत्ति होनेपर प्राप्त हुआ-सा ज्ञात होता है। ज्ञानक्रियाका कर्म, जो ज्ञेय वस्तुका जानना है, उस प्रकार ज्ञानके फलरूप- से ज्ञेय न होनेपर भी वह आत्मा सबके हृदयमें अधिष्ठित है तथा स्वयं साक्षात् ज्ञानस्वरूप है। अमानित्वादि साधनोंसे प्रतिबन्ध दूर होकर इसका प्रकाश होनेके कारण इसे 'ज्ञेय' कहा गया है। आत्मा स्वप्रकाशस्वरूप स्वयंसिद्ध है, अतएव वह आवरण-भङ्गरूप वृत्तिव्याप्तिका ही विषय है, उसमें फलव्याप्ति कैसे हो सकती ? स्वप्रकाशस्वरूपत्वात् सिद्धत्वाच्च चिदात्मनः । वृत्तिव्याप्यत्वमेवास्तु फलव्याप्ति कथं भवेत् ॥ (सदाचार० ५) अर्थात् उसमे फलव्याप्ति नहीं हो सकती। अस्तु, जाग्रदादि सभी अवस्थाओंमे एक अद्वितीय निर्मल ज्ञान ( सत्ता ) ही सदा भास रहा है, परंतु उस सर्वव्यापक निरवधिक, केवल शुद्ध विज्ञानघनस्वरूपको मन्द भाग्यवाले नहीं जान सकते— ज्ञानमेक सदा भाति सर्वावस्थासु निर्मलम् । मन्दभाग्या न जानन्ति स्वरूप केवलं बृहत् ॥ (सदाचारानुसन्धानम् ३१) जो सबका साक्षी ज्ञानस्वरूप है, जो सब चराचर प्राणियोंका जीवनरूप है 'चेतनश्चेतनानाम्' है, वही आत्मा है और वही 'मैं हूँ' इस प्रकार जो जानता है और अनुभव करता है, वह मुक्त और कृतकृत्य है—इसमें कुछ भी सशय नही। प्रमाता ( अन्तःकरणविशिष्ट जीवात्मा ); प्रमाण ( प्रत्यक्षादि ); प्रमेय ( घट-पट आदि ) तथा (वृत्तिक्शान ) प्रमा जिस चैतन्य-प्रकाशसे प्रतीत होते हैं, उस चैतन्य-ज्ञानके लिये कौन प्रमाण चाहिये अर्थात् वह चैतन्य वस्तु स्वतः- सिद्ध स्वयंप्रकाश है. प्रमाणान्तरसे उसका ज्ञान नहीं हो सकता। क्योंकि वही तो प्रमाणोंका भी प्रमाण है अर्थात् प्रमाण भी उस चैतन्यसे ही प्रकाशित होकर प्रमाणित होते हैं। इसी आत्माको— एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवास साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥ ( श्वेताश्वतर० ६ । ११ ) 'समस्त प्राणियोंमे एक ही देव स्थित है। वह सर्वव्यापक, समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों- मे बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करने- वाला, शुद्ध और निर्गुण है।' इस श्रुतिमे 'साक्षी' कहा गया है। भगवद्गीतामें भी 'उपद्रष्टानुमन्ता च' (१३ । २२) कहा गया है अर्थात् देह, चक्षु, मन और बुद्धिरूप दृश्य- पदार्थोंमें रहकर भी उन देह, चक्षु, मन और बुद्धि आदिके समस्त व्यापारोंको एवं दृश्योंको अविक्रियरूपसे वह देखता है। इसलिये 'उपद्रष्टा' है और उन देह, इन्द्रिय प्रभृतिको अपने- अपने व्यापारमें अपनी-अपनी इच्छानुसार प्रवृत्त होनेपर उन्हे रोकता भी नहीं—वह केवल साक्षीरूपसे सब कुछ देखता है—अतः आत्मा स्वभावसे ही साक्षी एवं द्रष्टा है। इसलिये द्रष्टाभाव आत्माका स्वरूप है। इसकी गाढ अवस्थामें सविकल्प समाधि लगती है। अतः सब कालमें विराजमान सच्चिदानन्द- घन निर्गुण निर्विकार निराकार आत्माका द्रष्टाभाव रखना ब्रह्माभ्यास ही है तथा यह उच्चकोटिकी साधना है। चित्तगत काम, सकल्प प्रभृति वृत्तियाँ दृश्य हैं, आत्म- चैतन्य उनका द्रष्टा है, इस भावसे आत्मचैतन्यका ध्यान करना चाहिये अर्थात् उन काम-संकल्पादि वृत्तियोंमेसे प्रत्येक वृत्तिको द्रष्टाका दृश्यरूप जानकर तथा जो चैतन्य उन वृत्तियोंका साक्षी हुआ है, उस द्रष्टा साक्षीको ही अपना यथार्थ स्वरूप जानना चाहिये। मैं असङ्ग, सच्चिदानन्द स्वयंप्रकाश हूँ तथा सब प्रकारके काम-सकल्पादि द्वैतसे वर्जित हूँ, स्वगत, सजातीय तथा विजातीय भेदसे शून्य अन्तरात्मस्वरूप साक्षी