कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंRegd. No. A. 175. श्रीहरिः भगवान् ही सब कुछ हैं स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥ स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् । ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥ सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । सम्पश्यन् ब्रह्म परमं याति नान्येन हेतुना ॥ ( कैवल्योपनिषद् ८–१० ) वे (परात्पर परब्रह्म परमेश्वर ही) चतुर्मुख ब्रह्मा हैं, वे ही पञ्चमुख शिव हैं, वे ही देवराज इन्द्र हैं, वे ही अक्षर परमात्मा हैं, वे ही चतुर्भुज विष्णु हैं, वे प्राण हैं, वे काल हैं, वे अग्नि हैं, वे चन्द्रमा हैं। जो कुछ हो चुका और जो कुछ आगे होनेवाला है, सब वे ही हैं। उन सनातन भगवान्को जानकर जीव मृत्युके परे चला जाता है। इसके अतिरिक्त मुक्तिका अन्य कोई उपाय नहीं है। जो इन परमात्माको सब चराचर भूत- प्राणियोंमें देखता है और सब भूतप्राणियोंको परमात्मामें देखता है अर्थात् सब प्रकारसे एक भगवान्को ही सदा सर्वत्र देखता है, वह उन पर- ब्रह्मको प्राप्त करता है। दूसरे किसी उपायसे उनकी प्राप्ति नहीं होती।