कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 164 में से
संदर्भ में पढ़ें१४श सर्ग ] प्रकृति-व्यसन। ९९ हइले दुष्ययुक्त हइलेओ युद्धे नियुक्त करिबे ॥८५॥ विपत्काले स्वकीय विषय- मध्ये विकीर्णभावापन्न सैन्यदलके स्वविक्षिप्त कहे; एइ सैन्य युद्धे असमर्थ। उपयुक्त देशकाल पाओयाय मित्र-विक्षिप्त अर्थात् मित्रके देओया हइयाछे ये सैन्यदल ताहारा युद्धे अनुपयोगी ॥८६॥ बीबध बलिते धान्यादि रसद-वस्तुर प्राप्ति, एवं आसार बलिते सुहृद्बल। विच्छिन्न-बीबध सैन्यदल ओ विच्छिन्न-आसार सैन्यदल इहारा युद्धेर उपयुक्त नय ॥८७॥ जनपदबासीर अरक्षित सैन्यके शून्यमूल बले; इहारा युद्धे समर्थ। पिता-पितामहक्रमे पालकव्यक्ति शून्य हइले एइ शून्यमूल सैन्यदल युद्धे अक्षम ॥८८॥ मौलकर्तृक पालित शून्यमूल-सैन्यगण युद्धे समर्थ। *। स्वामीर सहित असम्बद्ध सैन्यके अस्वामि-सङ्गत-सैन्य कहे; इहारा युद्धेर अनुपयोगी ॥८९॥ भिन्नकूट अर्थे अनायक। अतएव भिन्नकूट सैन्यदलके युद्धे नियुक्त करिबे ना। दुष्पार्ष्णिग्राह बलिते ये सैन्यदलेर पार्ष्णिग्राह पश्चात् कोपेते अत्यन्त सन्तप्त हइयाछे; एइरूप सैन्यदल युद्धे असमर्थ ॥९०॥ उपदेष्टा-विरहितके अन्ध बले। ये सैन्यदले उपदेष्टा नाइ सेइ अन्ध-सैन्यदल मूढ; इहारा युद्धे अक्षम। एइ बल-व्यसनादि, साध्य कि असाध्य अर्थात् इहार प्रतीकार सम्भव कि असम्भव, তাহা सम्यक्रूपे विवेचना करिया अभियान करिबे ॥९१॥ दैवव्यसन, शत्रु-पीडा एवं काम आर क्रोध हइते उत्पन्न लोक-प्रसिद्ध मृगयादि ओ वाक्पारुष्यादि दोष—एइगुली मित्रव्यसन ॥९२॥ नरेन्द्र प्रभृति ये सातटि प्रकृति बला हइयाछे ताहारिगेर ये व्यसन, ताहारा पूर्व्व पूर्व्व गुरुतर बलिया कथित हय अर्थात् मित्रव्यसन हइते दण्डव्यसन गुरुतर, दण्डव्यसन अपेक्षाय कोषव्यसन गुरुतर, कोष- व्यसन अपेक्षाय दुर्गव्यसन गुरुतर, दुर्गव्यसन अपेक्षाय जनपदव्यसन
- ८८ संख्यक श्लोकेर अर्द्धेक हइते एइ पर्य्यन्त कलिकाता संस्करणे नाइ।