कामन्दकीय नीतिसार (आचार्य कामन्दक - प्राचीन भारतीय राजनीति शास्त्र)
Kamandakiya Nitisara with Hindi Commentary
आचार्य कामन्दक / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें৮ম সর্গ ] আচারব্যবस्थापन। ৫১ सातटि करिया प्रकृति आछे, अतएव सर्व्वसमेत एकविंशति प्रकृति ॥३३॥ मौलिक राजा—अरि, विजिगीषु, मध्यम ओ उदासीन--चारिजन। इहादिगेर प्रत्येकेर मित्र पृथक् धरिले आठजन हय। एइ आठजनेर प्रत्येकेर अमात्यादि पञ्चप्रकृति पृथक् धरिले जगती अक्षर परिमित अर्थात् मूल राजा चारिजन ओ बन्धु चारिजन, एइ आटेर अमात्यादि द्रव्य-प्रकृति चल्लिश, मोट आठचल्लिश; इहार नाम जगती-मण्डल ॥३४॥ मण्डलज्ञेरा बलिया थाकेन ये, विजिगीषु ओ ताहार पुरोभागेर अरि, मित्र, अरिमित्र, मित्रमित्र ओ मित्रारिमित्रमित्र एइ पाँचजन एव पश्चाते पार्ष्णिग्राह, आक्रन्द, आक्रन्दासार ओ पार्ष्णिग्राहासार एइ चारि, एइ सकलके लइया दशक-मण्डल हय ॥३५॥ एइ दशजन राजार अमात्यादि प्रकृतिर पृथक् पृथक् गणना करिले षष्टि संख्या हय (१० × ५ = ५० + १० = ६०), इहाकेई मण्डलवित् पण्डितेरा षष्टिसंख्याक- मण्डल बलेन ॥३६॥ विजिगीषुर सम्मुखे शत्रु एव मित्र एइ दुइ, स्वयं विजिगीषु एव पश्चाते शत्रु ओ मित्र एइ दुइ, एकूने पाँच; इहादेर प्रत्येकेर अमात्यादि प्रकृति पृथक् धरिया पँचिश; एइ पँचिश ओ पूर्व्वोक्त पाँच मोट त्रिश, इहाके त्रिंशत्-मण्डल कहे ॥३७॥ बहुदर्शीगण विजिगीषुर मण्डलेर विभागेर न्याय शत्रुरओ मण्डलेर विभाग देखिया थाकेन। मनीषिगण [ शत्रुर मण्डलविभाग सम्बन्धे ] पञ्चक-मण्डलई उपयुक्त बलेन एव त्रितय-मण्डलेर कथाओ बलेन। ( पाठान्तरे—मनीषिगण बलेन ये शत्रुर पाँचटाई मण्डल एव त्रिंशत्-मण्डलओ आछे अर्थात् पाँचटाई राजप्रकृति एव ५ × ५ = २५टि द्रव्यप्रकृति ) ॥३८॥ पराशर बलेन ये प्रकृतपक्षे प्रकृति दुइटि—एकटि अभियोक्ता, अन्यटि अभियुक्त। अभियोग- कारी बलियाइ अभियोक्ता प्रधान, आर याहार उपर अभियोग करा हय सेइ अभियुक्त अप्रधान। फलतः विजिगीषु ओ अरि एइ दुइ प्रकृति ॥३९॥ विजिगीषु एव अरि परस्पर परस्परेर प्रति अभियोग कराय उभयेर अवस्था एक प्रकारइ हवाय प्रकृतपक्षे एकइ प्रकृति ॥४०॥ एइरूपे