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कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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कंबन ने समयुगीन भावनाओं को भली भाँति पहचाना था। जनता की भक्तिपूत भावना के कारण राम के चरित्र में जो महत्ता और परम-परिपूर्णत्व उत्पन्न हो गये थे उन्हें इस कुशल कवि ने अपने काव्य के द्वारा परिपुष्ट कर दिया। यह कोई साधारण कार्य नहीं था। केवल यह कहते रहने से कि राम परमात्मा हैं या स्थान-स्थान पर दैवी विशेषणों को जोड़ते रहने से यह ज्ञान हो सकता है कि राम परमात्मा के अवतार हैं, किन्तु उससे पाठकों पर राम के चरित्र का मानवोचित प्रभाव पड़ना सम्भव नहीं है। रस-पोषण के मार्ग में इस प्रकार की पुनरुक्ति से बाधा पड़ने की सम्भावना है। राम के दैवी तत्त्व का साहित्यिक प्रभाव उत्पन्न करना, पूरे काव्य में सब प्रसंगों के मध्य उस दैवी तत्त्व का निर्वाह करना एव साथ ही मानव-जीवन की विविध सुख-दुःखात्मक परिस्थितियों के साथ उस दैवी तत्त्व की संगति बिठाना—यह एक अनन्यसुलभ प्रतिभावान् महाकवि का ही कार्य है। कंबन ऐसे ही कवि थे। कंब रामायण का कोई भी प्रसंग इसका प्रमाण हो सकता है।

कंबन ने बालकांड से युद्धकांड तक छह कांडों की रचना की। पौराणिकों के कारण अनेक प्रक्षेप भी इसमें जुड़ गये हैं। किन्तु इन प्रक्षेपों को पहचानना उतना दुष्कर नहीं है: क्योंकि कंबन की भाषा और प्रतिपादन की शैली विलक्षण होती है, उनका अनुकरण नहीं हो सकता। अब उपलब्ध ग्रन्थ में १०,०५० पद्य हैं। एक उत्तरकांड प्राप्त हुआ है, जो कंबन के समकालिक एक अन्य महाकवि 'ओट्टक्कूत्तन' - विरचित माना जाता है।

तमिलनाडु में ही नहीं, उसके बाहर भी धीरे-धीरे इस रामायण का प्रचार हुआ। तंजाउर जिले में स्थित तिरुपणन्दाल मठ की एक शाखा काशी में है। उस मठ में आज से तीन-साढ़े तीन सौ वर्ष पूर्व कुमारगुरुपर नामक एक तमिल संत रहते थे, जो तुलसीदासजी के समकालीन थे। वे नित्य प्रति संध्या के समय गंगा-तट पर कंब रामायण की व्याख्या हिन्दी में सुनाया करते थे। गोस्वामी तुलसीदासजी उन्हीं दिनों काशी में रामचरित-मानस की रचना कर रहे थे। दक्षिण के लोगों में यह विश्वास प्रचलित है कि तुलसीदासजी ने मानस लिखने में अनेक स्थलों पर कंब रामायण से प्रेरणा प्राप्त की थी। इस कथन की प्रामाणिकता निर्विवाद नहीं है। किन्तु, इतना तो सत्य है कि तुलसी और कंबन की कृतियों में कई घटनाओं में आश्चर्यजनक समानता दिखाई पड़ती है।^१

अनुवाद का काम अनेक कारणों से कठिन होता है। पद्यकाव्य का अनुवाद और भी बहुत श्रमसाध्य है। कंबन की कृति बारहवीं शताब्दी की तमिल-शैली में लिखी गई है, उसका आधुनिक हिन्दी में यह अनुवाद लगभग पाँच वर्ष के अध्यवसाय से सम्पन्न हो सका है। मूल की अभिव्यक्तिगत सौंदर्य को भाषांतर में उसी रूप में प्रस्तुत करना असम्भव है। कंबन के भावगत सौंदर्य की किंचित् झलक-मात्र सम्भव हो सकी है। तमिल-भाषा की एक विशेषता यह है कि उसमें मिश्रवाक्य की रचना नहीं होती। सभी सरल


^१ डॉ० एन० शङ्करराजुनायुडु (हिन्दी-विभागाध्यक्ष मद्रास-विश्वविद्यालय) का प्रबन्ध 'कंबन और तुलसी' पृ० १८७-१८० ।