कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
पृष्ठ 102, कुल 549 में से
संदर्भ में पढ़ें६० कम्ब रामायण
वाला भी कोई व्यक्ति नही मिलेगा। यदि आज ही यह कुमार इसे चढ़ा दे, तो सीताजी का शुभ-विवाह सुसपन्न हो सकेगा।
कुछ लोग कहते थे—इसे धनुप कहना धोखा है, यह सोने का पहाड मेरु है। कुछ कहत थे—ब्रह्मा न इसे अपने हाथो से स्पर्श करके नही बनाया, किन्तु अपने महान् तप के प्रभाव से ही इसे निर्मित किया है ओर कुछ कहतं थे—न जाने पूर्व काल मे इसे कौन चढ़ाता था ?
कुछ कहंत थे--दृढ मेरु को ही इस धनुप का आकार दिया गया है, या पूर्वकाल मे जिम मंदरपर्वत से क्षीरसागर को मथा गया था, वही पर्वत इस धनुप के रूप में यहाँ पडा हे, या प्रभावशाली, प्रकाशमान सर्पराज (आदिशेप) ही है यह, या गगनस्थ दीर्घ इन्द्र-धनुष ही अब किमी प्रकार यहाँ आ गिरा है।
कुछ कहत थे—महाराज ने इसे ले आने की आज्ञा ही क्यो दी ? इसे प्रणबध बनानेवाले उनके जैमा बुद्धिहीन व्यक्ति कोई है क्या ? कुछ कहते--पूर्व-पुण्य से ही यह कार्य पूर्ण हो भी सकता है। कुछ कहते—क्या सीता ने अपने (विवाह के) लिए दाँव पर रखे गये इस धनुप को कभी देखा भी है ?
कुछ कहते--इस धनुप से छोडे गंय वाण का लक्ष्य कौन हो सकता है ? कुछ कहतं—इस महान् धनुष को अपनी कन्या के सामर्थ्य के अनुरूप ही बनाया है। कुछ कहते—चक्रायुध धारण करनेवाला (महाविष्णु) क्या निश्चय ही इस धनुष को झुका सकता है ? कुछ कहते—यह पूर्वजन्म-कृत पाप ही है (जो प्रणबंध होकर यहाँ पड़ा है)।
वहाँ एकत्र नर-नारी इस प्रकार के वचन कह रहे थे, तब सेवको ने वह धनुष जनक के सम्मुख रखा, जिससे धरित्री की पीठ नीचे को धँम गई। उस धनुष को देखते ही वहाँ के राजाओ की भुजाएँ, यह सोचकर कि 'इसे कौन चढ़ा सकता है?', काँपने लगी।
जनक महाराज (कभी) कलभ जैसे उस वीरकुमार (राम) के सौन्दर्य को देखते, कभी दुःख देनेवाले उस बडे धनुष को देखते, फिर अपनी पुत्री (सीता) की ओर देखत । उनके मन की अधीरता को जानकर शतानन्द कहने लगे---
मेरु को धनुष बनानेवाले शिवजी, अपने पार्श्व मे रहनेवाली उमा का अपमान करनेवाले दक्ष के यज्ञ मे, क्षमारहित क्रोध के साथ, इसी धनुष को लेकर गये थे।
(शिवजी के किये गये आघातो से उन देवताओ के) दाँत और हाथ टूटकर गिर पडे। वे देवता भागे और अज्ञात स्थानो मे जा छिपे। दक्ष की यागाग्मियाँ ध्वस्त हो गई' , तब जाकर त्रिनेत्र तथा अष्टभुजावाले रुद्र का क्रोध शान्त हुआ।
उसके बाद शिवजी ने देवों की थरथराहट देखी। उन देवो की आयु अभी शेष थी। अतः, (शिवजी ने) उस दृढ धनुष को इस वृषभ-समान वीर जनक के वंश में उत्पन्न एक खड्गधारी नरेश को दे दिया।
इस धनुष की कठोरता के बारे मे मुझे कहना ही क्या है ? दीर्घजटाधारी (शिव)