कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Kamba Ramayana Hindi
महाकवि कम्बन द्वारा
स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमंगलाचरण
काव्य-पीठिका
हम उस भगवान् की ही शरण में हैं, जो समस्त लोको का सर्जन, उनकी रक्षा और उनका विनाश—ये तीनो क्रीडाएँ निरंतर करता रहता है ।
बड़े-बड़े आत्मज्ञानी भी उस परमात्मा के पूर्ण स्वरूप को नही जान सकते, उस परमात्मा (के तत्त्व) को समझाना मेरे जैसे (मंदबुद्धि) व्यक्ति के लिए असंभव है; फिर भी शास्त्रो में प्रतिपादित त्रिगुणो (सत्त्व, रज और तम) मे—जिनका प्रतिरूप बनकर वह परमात्मा त्रिमूर्त्ति के रूप में प्रकट हुआ, उनमें से प्रथम गुण के स्वरूप (विष्णु) भगवान् के कल्याणकारक गुणों के सागर में गोते लगाना तो उत्तम ही है।
जिन ज्ञानियों ने आरंभ तथा समाप्ति में 'हरि: ॐ' कहकर नित्य और अनन्त वेदो को अधिगत (प्राप्त) कर लिया है और जो अपने परिपक्व ज्ञान के कारण संसार-त्यागी बन चुके है, वे महानुभाव उस (विष्णु) भगवान् के उन चरणो को, जो सन्मार्ग पर चलनेवाले भक्तों के उद्धारक हैं, छोड़कर अन्य किसी से प्रेम नहीं करते।
अकलंक विजयश्री से विभूषित (श्रीरामचन्द्र) के गुणो का वर्णन करने की अभिलाषा मैं कर रहा हूँ; यह ऐसा ही है, जैसा कि कोई बिल्ली, घोर गर्जन करनेवाले ऊँची तरंगों से भरे क्षीरसागर के निकट पहुँचकर उसके समस्त क्षीर को पी जाने की अभिलाषा करे।
अभिशाप¹ की वाणी से (उस दिन) सप्त तालवृक्षो को एक साथ भेदन कर देनेवाले (श्रीराम) की महान् गाथा आविर्भूत हो गई थी; उस गाथा को मधुर काव्य के रूप में कहनेवाले (वाल्मीकि) की वाणी जिस देश में सुस्थिर हो चुकी है, वही मैं भी अपने (अर्थगांभीर्य-हीन) सरल तथा दुर्बल शब्दों में दूसरा काव्य रचना चाहता हूँ—यह भी कैसा (बुद्धिहीन) प्रयास है।
१. क्रौंच को मारनेवाले व्याध के प्रति वाल्मीकि के मुँह से जो अभिशाप-वचन निकल पडा था, वही रामायण का प्रथम मंगलाचरण भी हुआ।