भारतकोश
कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

कम्ब रामायण (महाकवि कम्बन - प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Kamba Ramayana Hindi

महाकवि कम्बन द्वारा

स्रोत: Kamba Ramayana in Hindi Translation (Vol 1) (उद्गम)

DevanagariHindipublished549 पृष्ठ

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वक्तव्य

सम्पूर्ण भारतीय राष्ट्र की एकात्म भावना और अखण्ड संस्कृति के निर्माण का सारा श्रेय संस्कृत-भाषा को है, जिसने कैलास से रामेश्वरम् तथा पश्चिम समुद्र से पूर्व सागर तक के जनमानस को एक साँचे में ढाल दिया था। आज उसी संस्कृत की तरह राष्ट्र को एक सूत्र में गूँथे रखने की शक्ति यदि किसी भाषा में है, तो वह राष्ट्रभाषा हिन्दी है। राष्ट्रभाषा देश की आत्मा होती है, जिसे राष्ट्र-रूपी शरीर की सभी धमनियों से रक्त-प्राप्ति आवश्यक है। दूसरी बात कि अब हिन्दी को स्वयं इस प्रकार समर्थ होना है, जिसके माध्यम से चाहे तो कोई भी समस्त भारतीय साहित्य और संस्कृति को समझ ले। इन्हीं दृष्टिकोणों के अनुसार बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् ने ग्रन्थ-प्रकाशन का श्रीगणेश किया था और निश्चय किया था कि दक्षिण के चारो भाषाओ (तेलुगु, तमिल, कन्नड और मलयालम) की रामायणों के हिन्दी-अनुवाद यहाँ से प्रकाशित किये जायें। आज हमें प्रसन्नता है कि परिषद् ने तेलुगु की 'रंगनाथ रामायण' को प्रकाशित तो किया ही, अब तमिल की 'कंब-रामायण' का भी हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित कर अपना संकल्प पूरा कर लिया।

यह 'कंब रामायण' परिषद् की अनुवाद-योजना का बारहवाँ ग्रन्थ है। परिषद् ने इसके पहले जर्मन, फ्रेंच, अँगरेजी, संस्कृत और तेलुगु-भाषाओं के ग्रन्थों के अनुवाद प्रकाशित किये थे। यह तमिल से अनूदित है, जिसका साहित्य, संस्कृत को छोड़कर, सभी जीवित भारतीय भाषाओं के साहित्य से प्राचीन है। आज भी दक्षिण की सभी भाषाओं के साहित्य से तमिल-साहित्य सुसम्पन्न और सुष्ठु माना जाता है।

प्रस्तुत ग्रन्थ तमिल का महाकाव्य है, जो बारह सौ वर्ष (कुछ के मतो से आठ सौ वर्ष) पुराना है। इस महाकाव्य की रचना-शैली बाणभट्ट की 'कादम्बरी' की-सी है; किन्तु इसका रचना-आधार वाल्मीकीय रामायण है। यद्यपि 'कंब-रामायण' वाल्मीकीय रामायण का अनुगामी है, तथापि दाक्षिणात्य संस्कृति से यह ओत-प्रोत है, जो वाल्मीकीय में दृष्टिगोचर नही होती। यह एक महान् आश्चर्य है कि काव्य के सौष्ठव की दृष्टि से भी यह ग्रन्थ वाल्मीकीय रामायण से जरा भी घटकर नही है। हमारे ऐसे कथन की यथार्थता प्रबुद्ध पाठक स्वयं इसमे आँकेंगे। किन्तु, आश्चर्य की बात यह है कि ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ का अनुवाद आजतक दुनिया के किसी भी भाषा में नही छुपा था, यहाँतक कि अँगरेजी-भाषा में भी नही। हिन्दी में इसका अनुवाद कराकर सर्वप्रथम प्रकाशित करने का सौभाग्य परिषद् को ही है।

परिषद् ने जब 'कंब रामायण' के अनुवाद कराने का निश्चय किया, तब एक जटिल समस्या सामने आई कि अनुवाद किससे कराया जाय ? क्योकि दक्षिण की भाषाओ मे भी दुरूह तमिल-भाषा है और उसके काव्यो में भी अत्युच्च महाकाव्य 'कंब रामायण' है, जिसका सजीव हिन्दी-अनुवाद केवल तमिल और हिन्दी जाननेवाला नही कर सकता था। इसके लिए उक्त दोनों भाषाओ के साहित्य-मर्मज्ञ के साथ-साथ संस्कृत-साहित्य के